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सम्मान

डॉ. वंदना मिश्र ‘मोहिनी’
इन्दौर(मध्यप्रदेश)
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मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि,हमारे बीच ऐसा कुछ नहीं हो सकता हैl केशव की आँखों में यह कहते हुए गुस्सा भी था और किसी अपने को समझाने वाला अपनत्व भीl जो तुमको कहा है,तुम सिर्फ वो ही करो लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं कि हमारे बीच कुछ होना जरूरी है। यह कहते हुए अपने बालों की लट जो उसके लाल सुर्ख गालों पर आ रही थी,उनको कान के पीछे समेटते हुए गुस्से में कहा-“क्या मुझमें कोई भी ऐसी बात नहीं,जिसे तुम बोल सको जो तुम्हें आकर्षित करती हो…!” इस बार उसके गुस्से के साथ शिकायत शामिल हो गयी थी।
केशव ने बेपरवाह अंदाज में कहा-“तुम्हारी उम्र अभी बहुत कम हैl आगे तुम्हारा पूरा करियर है,तुम करियर बनाने में ध्यान दो और इन दो-तीन सालों में तुम्हें यह तय कर लेना चाहिए कि तुम्हें आगे किस दिशा में जाना है।” केशव ने शब्दों पर जोर देते हुए समझाने का प्रयास किया।
“मेरे करियर की दिशा…तुमको मेरी चिंता नहीं,मेरे करियर की फिक्र हैl नहीं बनाना मुझे कोई करियर…मेरी दिशा तो तुम होl बोलो, बनोगे मेरे साथी ?”
केशव ने कहा-“बचपन की इस उम्र में हमें किसी खिलौने से लगाव हो जाता है,और कुछ ही दिन बाद वो जो खिलौना है,हमें पुराना लगने लगता हैl तुम अभी ऐसी अवस्था में ही होl बात को समझने की कोशिश करो दर्शनी…l”
वह पलट कर विस्मित नजरों से केशव को देखने लगी और मन ही मन जैसे कोई संकल्प करते हुए बोली-“तो फिर ठीक,यह आज तय रहा जो तुम्हें मानना है,वो तुम मानोl जो मुझे ठीक लगता है,वह मैं करूँगी लेकिन अगर तुम यह कहना चाहते हो कि मैं एक खिलौने की तरह तुमसे आकर्षित हूँ तो फिर मेरी ज़िंदगी खेल से ज्यादा कुछ नहीं।” इतना बोलकर रोते हुए दर्शनी उधर से चली गई।
समय पँख लगा कर उड़ चला,और दर्शनी अब एक अच्छे उच्च पद पर कार्यरत थी,पर उसके हृदय में केशव की यादें जैसी थी,वैसी रही..l इधर,केशव अपने मिशन के कार्य में तल्लीन रहाl इस अनजाने सफर में उसकी एक मित्र बनी राधिका,जो सामान्य रंग-रूप की सादगी से परिपूर्ण,उम्र में केशव से बड़ी,पर वह केशव के रंग में ऐसी रँगी कि,सब-कुछ भूल हर पल सिर्फ केशव के रंग में रँगी रहतीl यह जानते हुए भी कि केशव इन सब बातों से बहुत दूर हैl फिर उम्र का अंतर भी इतना तथा दोनों को देख कर लगता नहीं था कि राधिका केशव से बड़ी है,क्योकि लगता तो यह था कि भगवान ने उसे बड़ी तल्लीनता से बनाया हो।
“सुनो! मैंने तुम्हारे कपड़े प्रेस कर दिए हैंl खाना तुम्हारे घर पहुँच कर बना दूँगी और हाँ..वो तुम्हारे बैंक का काम रास्ते में जाते हुए कर दूँगी,लौटते में तुम्हारे योगा की मेट और तुम्हारे लिए पपीता लेते आऊँगी।” ऐसा कहते हुए राधिका जल्दी-जल्दी चली गईंl उसे केशव के सभी कार्य करना अच्छा लगता था। उसे जाते हुए देख केशव सोच रहा था कितनी प्यारी दोस्त है,मैं इसका साथ कभी नहीं छोडूंगा।
उन दोनों के बीच एक अनकहा प्रेम भरा बड़ा प्यारा रिश्ता था,जैसे दो शरीर एक आत्माl वो बिन विवाह के भी एक-दूसरे के साथ बहुत खुश थे। कभी-कभी छोटी-छोटी बातों पर नोक-झोंक हो जाया करती,तो उस दिन से दोनों एक-दो दिन बात नहीं करते,पर उन दिनों राधिका बहुत उदास रहती हैl जैसे,उसकी जिंदगी थम गई हो,पर एक बात बड़ी अजीब थी,केशव को कोई फर्क नहीं पड़ताl वह बहुत सहज रहता,यह बात कई बार राधिका को अटकती थी। दिन बीत रहे थे,पर अब केशव धीरे-धीरे कुछ बदल रहा थाl कई बार मजाक में वह दर्शनी का ज़िक्र छेड़ देता तो राधिका अंदर से सिहर जाती।
इस बीच किसी जरूरी कार्य से केशव को दूसरे शहर में रहना पड़ा,पर उसके और राधिका के रिश्ते में कोई फर्क नहीं पड़ा। समय आगे खिसक रहा था और दोनों का रिश्ता भी।
उधर,दर्शनी ने अभी भी विवाह नहीं किया थाl वह अब एक बड़े अधिकारिक पद पर थीl केशव की बातों से झलकता था कि उसे इस बात का बड़ा रस्क था कि,आज भी दर्शनी को उसकी एक हाँ का इंतजार है,पर केशव ने तो विवाह न करने की ठान रखी थीl वह अपना पूरा जीवन समाजसेवा में लगाना चाहता था। इधर,राधिका अपने नाम के अनुरूप केशव के रंग में रंगी हुई थी। वह केशव के लिए बिना सोचे-समझे वो करती थी,जो केशव को चाहिए…वो भी बिना किसी स्वार्थ के,पर अब केशव बदल रहा रहा थाl यह बदलाव राधिका महसूस कर रही थी आज। उसका मन कई अटकलें लगाता रहता,पर वह कर भी क्या सकती थी..l वो यह भूल चुकी थी,वो वहीं ठहर गई,पर केशव नहीं।
वह अक्सर बोलता-“किसी तरह से जो तुमने मेरे बुरे वक्त में मेरा साथ दिया,उसे चुका सकूँl”
जब वो यह बोलता था तो राधिका आँखों में आँसू लिए बोलती…-“कैसे चुका पाओगे मेरे प्रेम के इन आँसूओं की कीमत….!” केशव हँस कर बात को टाल देता,पर आज बात थोड़ी अलग थीl राधिका के फोन लगाते से ही केशव बोला-“कितनी बार तुमसे कहा कि,मेरी स्वतंत्रता में बाधा मत बनोl मेरी स्वतंत्रता मुझे तुमसे भी प्यारी हैl किसी दिन तुमसे हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ लूंगाl तुम्हारे और मेरे विचार एकदम अलग…यह घर-धंधे की उटपटांग की तुम्हारी बातों से ऊब गया हूँ मैंl समझो! हाथ जोड़ता हूँ मेरा पीछा छोड़ दोl फोन कम किया करो,यदि मुझे यही सब करना होता तो बहुत थी मेरे पासl तुम हो क्या उनके सामने! मैं कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हूँ…l” और भी पता नहीं क्या-क्या केशव बोलते चला गया और उसने फोन काट दिया।
आज राधिका के ह्दय पर बहुत बड़ा आघात लगा। उसकी आँखों के सामने से केशव के साथ बिताए पूरे दस साल एक चलचित्र की भांति चल रहे थे। ऐसा लगा,जैसे किसी ने वर्षों की तपस्या भंग कर दी हो। आज पहली बार राधिका की आँखों में आँसू नहीं थेl वह चुप हो गई थी,जैसे तूफान के बाद शान्ति…।
उसने दोबारा केशव को फोन नहीं लगाया और न ही पलट कर केशव ने किया। कुछ दिन बात बन्द रही,केशव का फोन आया तो फिर वह सहजता से बात करने लगी,लेकिन उस दिन से राधिका के हृदय में एक रिक्तता आ गई थी,जो समय के साथ बढ़ती गईl अक्सर वह सोचती,कितना कुछ किया बिना सोचे बिना कोई कारण के… क्या वो इतनी बुरी है ? क्या केशव को एक बार भी मुझसे लगाव नहीं हुआ…काश! एक बार तो वो कह देता कि,उसे भी मुझसे….l
कुछ दिनों बाद पता चला कि,केशव को समाजसेवा के लिए के लिए बहुत बड़ा सम्मान(अवार्ड)` मिलने वाला है। राधिका एक मनोचिकित्सालय में अपने बिस्तर पर पड़ी केशव के दिए हुए राधाकृष्ण के लॉकेट को निहार रही थी। तभी उसने देखा सामने दूरदर्शन पर केशव राष्ट्रपति के हाथों से सम्मान ले रहा है और दर्शनी मुख्य अतिथि की पहली पंक्ति में बैठ कर ताली बजा रही है। फिर केशव ने दर्शनी का हाथ थामा और मंच पर ले आया। इधर राधिका भी जोर-जोर से ताली बजाने लगी,तभी नर्स हँसते हुए बोली-“देखो! इस पगली को क्या समझ पड़ रहा है इसे अवार्ड के बारे में…,और उसे डांटते हुए कसकर दोनों हाथ बांध दिए।

परिचय-डॉ. वंदना मिश्र का वर्तमान और स्थाई निवास मध्यप्रदेश के साहित्यिक जिले इन्दौर में है। उपनाम ‘मोहिनी’ से लेखन में सक्रिय डॉ. मिश्र की जन्म तारीख ४ अक्टूबर १९७२ और जन्म स्थान-भोपाल है। हिंदी का भाषा ज्ञान रखने वाली डॉ. मिश्र ने एम.ए. (हिन्दी),एम.फिल.(हिन्दी)व एम.एड.सहित पी-एच.डी. की शिक्षा ली है। आपका कार्य क्षेत्र-शिक्षण(नौकरी)है। लेखन विधा-कविता, लघुकथा और लेख है। आपकी रचनाओं का प्रकाशन कुछ पत्रिकाओं ओर समाचार पत्र में हुआ है। इनको ‘श्रेष्ठ शिक्षक’ सम्मान मिला है। आप ब्लॉग पर भी लिखती हैं। लेखनी का उद्देश्य-समाज की वर्तमान पृष्ठभूमि पर लिखना और समझना है। अम्रता प्रीतम को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाली ‘मोहिनी’ के प्रेरणापुंज-कृष्ण हैं। आपकी विशेषज्ञता-दूसरों को मदद करना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिन्दी की पताका पूरे विश्व में लहराए।” डॉ. मिश्र का जीवन लक्ष्य-अच्छी पुस्तकें लिखना है।

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