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आत्म संवाद

अंशु प्रजापति
पौड़ी गढ़वाल(उत्तराखण्ड)
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अपने हृदय संसार में जब मैं उतरती हूँ,
प्रतिपल की अनुभूति सहेज कर चलती हूँ।
अन्तर्मन के शब्द मौन,
मौन ही वाद-विवाद
उस क्षण में न कोई दुःख,
न कोई अवसाद।
मेरे प्रश्न मेरे ही उत्तर,
न समय का पहरा
उतनी शांत होती जाती हूँ ,
जितना उतरूं गहरा।
आत्म मंथन नितप्रति होता,
क्या उचित क्या अनुचित
क्षमा प्रार्थना स्वयं से होती,
न रहता कुछ कलुषित।
आत्म मंथन किया जब कभी,
व्यर्थ कभी न पाया
विष कभी पिया मैंने तो,
कभी अमृत हिस्से आया।
व्यथित हुआ हृदय जब कभी,
प्रश्न ख़ुद से दोहराया
क्या अनुचित हुआ मुझसे,
जो दुःख हिस्से में आया।
प्रसन्न जब कभी हुई,
तब भी बतियाई स्वयं से
किस प्रकार बाँटू प्रसन्नता,
यही सोचती सबसे॥
अपना मूल्यांकन भी है,
एक तपस्या जैसा
हुआ सफल जो भी इस तप में,
बना स्वर्ण के जैसा।
संवाद स्वयं से आवश्यक है,
इस क्षण भंगुर जीवन में
बिन संवाद अंतर ही क्या है,
पाहन और मानव में।
स्वच्छता तो आवश्यक है,
हो तन की या मन की।
बाकी सब परमेश्वर हाथ,
यही कुन्जी जीवन की॥

परिचय-अंशु प्रजापति का बसेरा वर्तमान में उत्तराखंड के कोटद्वार (जिला-पौड़ी गढ़वाल) में है। २५ मार्च १९८० को आगरा में जन्मी अंशु का स्थाई पता कोटद्वार ही है। हिंदी भाषा का ज्ञान रखने वाली अंशु ने बीएससी सहित बीटीसी और एम.ए.(हिंदी)की शिक्षा पाई है। आपका कार्यक्षेत्र-अध्यापन (नौकरी) है। लेखन विधा-लेख तथा कविता है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-शिवानी व महादेवी वर्मा तो प्रेरणापुंज-शिवानी हैं। विशेषज्ञता-कविता रचने में है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“अपने देेश की संस्कृति व भाषा पर मुझे गर्व है।”