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भ्रष्टाचार के कारणों को मिटाना होगा

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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मनपसंद सरकार यानी मध्य प्रदेश शासन के मुख्य सचिव और अपर सचिव को सीबीडीटी द्वारा भ्रष्टाचार बाबत तलब किया गया, तो तेलंगाना पुलिस ने करोड़ों के क़र्ज़ के घोटाले का भंडाफोड़ किया। ऐसे नित्य कहीं न कहीं भ्रष्टाचार देश में होते रहते हैं,जिसे आम बात कह सकते हैं। यह ‘कोरोना’ जैसा सर्वव्यापी है,इससे कोई नहीं बचा चाहे नेता,अभिनेता,धनवान,मंत्री,संतरी,बाबू चपरासी। इसे आजकल अन्य-आय कहते हैं।
यह प्रश्न मानसिक है या भौतिकतावाद से जुड़ा हैं या नैतिकता से,कि एक साल में भारत में भ्रष्टाचार बढ़ा। यह स्थिति ऐसी है कि,जितना हम छाया को पकड़ने का प्रयास करते हैं वह उतनी बढ़ती जाती है। हमको सिखाया जाता है कि हमें झूठ नहीं बोलना चाहिए! यह नहीं सिखाया जाता है कि,हमें सच बोलना चाहिए। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि,हम जिस बात पर जोर देते हैं,उसके विपरीत चलते हैं। जैसे किसी स्थान पर लिखा है,यहाँ पेशाब करना मना है,तो वहां जरूर करेंगे। यदि उसकी जगह यह लिख दिया जाए कि,यहाँ पेशाब कर आगे जाओ तो आदमी समझेगा कि,यहाँ कोई बात तो नहीं है,कैमरा तो नहीं लगा है। ऐसे ही हम चौराहे पर लाल बत्ती का उल्लंघन अवश्य करते हैं।
शिवपुरी में माधव राष्ट्रीय उद्यान के मुख्य द्वार के दोनों ओर दीवार पर लिखा है कि,काले परदे के पीछे बहुत खतरनाक जानवर है! आप पर्दा हटाकर देखेंगे तो वहां आईना लगा हुआ है,जिसमें स्वयं आपका अक्स सामने आ जाता है। सब जानवर, पशु-पक्षी अपने-अपने गुण-धर्म का पालन करते हैं, पर मनुष्य एक ऐसा जानवर है,जिसमें सब पशु-पक्षियों के गुण हैं,क्योंकि हम विवेकशील हैं।
इस समस्या को हमने बहुत विकट समस्या मान लिया है। हम अपने-आपसे यह नहीं कहते कि हमें ईमानदार बनना है। हम हमेशा कहते हैं-हमें भ्रष्टाचार नहीं करना है। यदि हम अवांछनीय समस्या की रट लगाते जाएँ,किन्तु उसे सुलझाने का प्रयत्न न करें तो समस्या बनी रहेगी। दूसरी बात यह महत्वपूर्ण है कि,हम परिणाम को मिटाना चाहते हैं,उसके कारण को नहीं। वर्तमान में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है,यह आवाज जितनी प्रबल है,उतनी उसे मिटाने का प्रयत्न नहीं है। भ्रष्टाचार एक परिणाम है, यह जब तक नहीं मिट सकता जब तक कि उसके कारण विद्यमान हैं।

प्रधानमंत्री का कहना है कि,’न हम खाएंगे और न किसी को खाने देंगे।’ यह कहना सरल है,पर करना कठिन है। यदि घोड़ा घास से यारी करेगा तो वह भूखा मर जाएगा। कुत्ते और शेर में क्या अंतर होता है ? कुत्ते को पत्थर मारो तो वह पत्थर की ओर दौड़ता है,जबकि शेर को आप गोली मारो तो वह मारने वाले की ओर झपटता है,यानी हमें मूल रूप से कारणों पर दृष्टिपात करना होगा। कारण कि बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। इसीलिएआयुर्वेद चिकित्सा में चिकित्सक पहले कारणों को दूर करता है,जिससे रोगी,रोग मुक्त हो जाता है,जबकि आधुनिक चिकित्सा में लक्षण के आधार पर चिकित्सा की जाती है।
अनुशासनहीनता,जीवन के झूठे मान,दंड और झूठी मान्यताएं,धन-लोलुपता,सत्ता या पद की लोलुपता, सामुदायिक जीवन के प्रति निष्ठा का अभाव,राष्ट्रप्रेम का अभाव,नैतिक शिक्षा काअभाव,प्रशासन कौशल का अभाव,सामाजिक रूढ़ियाँ,गरीबी,अपव्यय -फ़िज़ूलख़र्ची,नियंत्रण,महँगाईं,दलगत राजनीति, नियुक्ति में बरती जाने वाली पक्षपातपूर्ण नीति, प्रतियोगिता,प्रदर्शन एवं प्रतिष्ठा आदि,ये सब बातें नैतिकता से जुड़ी हो सकती हैं,पर व्यवहारिक धरातल पर कुछ बातें अपचनीय हैं। जैसे कोई लड़का बिना दहेज़ के शादी करना चाहता है,या करता है पर उसी को अपनी लड़की की शादी के लिए दहेज़ देना होता है। इसी प्रकार सामान्य वर्ग को किसी भी कार्यालय में जाने पर छोटे से छोटे काम के लिए सुविधा शुल्क देना पड़ता है।
बहुत पहले सामाजिक व्यवस्थाओं में आदमी पड़ोसी या नाते-रिश्तेदारों का लिहाज़ करके काम कर देते थे,पर वर्तमान में ऐसा नहीं होता है। इसका कारण यह है कि पड़ोसी या रिश्तेदार से हमारा सम्बन्ध खाने-पीने या चाय का है,और जिसको उस काम करने के लाखों रुपए मिलते हैं,वह कोई संबध नहीं निभाता पैसे के अलावा। ये सब बातें बोलने या भाषण देने से नहीं आएँगी,जब तक उनको अमली जामा न पहनाया जाए।
दरअसल,सुधार का मूल बीज है अनुशासन। जो आध्यात्मिक मूल्यों में विश्वास करते हैं,वे ही आत्मानुशासन को मूल्य देते हैं और वे लोग भी उसे मूल्य देते हैं जो केवल सामाजिक जीवन के मूल्यों में ही विश्वास करते हैं। आत्मानुशासन के अभाव में जब समाज या राज्य का अनुशासन चलता है,जब अनुशासन चलाने वाले स्वयं अनुशासनहीन बन जाते हैं,तब जनता भी अनुशासनहीन हो जाती है।
भ्रष्टाचार की जड़ें मानसिक वृत्तियों के कारण फैली हैं,जिसका कारण प्रकाश में आने की मनोवृत्ति,बड़ा बनने की मनोवृत्ति,पद या सत्ता पर अधिकार करने की मनोवृत्ति,सुख-सुविधापूर्ण जीवन बिताने की मनोवृत्ति,अनुकरण की मनोवृत्ति आदि ही सामाजिक जीवन में प्रतिबिंबित होती है। आचार संहिता ‘क्या करना चाहिए’ इस आधार पर बनती है। यदि हमारे जीवन में सदाचार के आधार विकसित होंगे तो भ्रष्टाचार अपने आप मिट जाएगा । भारत में भ्रष्टाचार इतना व्यापक हो गया है कि वह एक धक्के से गिरने वाला नहीं है। आज के चरित्र निष्ठ लोग इसी प्रतीक्षा में हैं कि ऐसा हो और तत्परता से हो।
घूसखोरी के विषय में नीति शास्त्रों में इतना तक लिख दिया गया है कि रिश्वतखोरी से जीविका चलाने वाले अपनी माता का स्तन भी काट लेते हैं। अर्थात अपने हितैषियों से भी रिश्वत ले लेते हैं,फिर दूसरों से लेना तो साधारण बात है।
विश्व स्तर पर समीक्षा से यह बात सामने आई है कि,भारत में भ्रष्टाचार बढ़ा है। इसका मतलब हमने भारतीय या मानवीय मूल्यों को त्यागा, जिसका उदाहरण जाहिर हुआ है। हमें इसमें समूह को देखने की जरुरत नहीं है। नगर निगम गन्दा पानी प्रदाय करता है,पर हम अपना पानी साफ़ कर पीते हैं। इसी प्रकार यह पहले व्यक्तिगत प्रश्न है। भांग पूरे तालाब या कुएं में घुली है तो बचना संभव नहीं है,पर इसमें सब लोग अपनी सहभागिता निभाएं तो भ्रष्टाचार कुछ हद तक कम हो सकता है।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।