डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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ये रात भी बड़ी अजीब होती हैं,
एक हसीना की तरह हसीन
कभी रंगीन तो कभी कमसिन।
रैन नशीली है और चाँद जवां,
नैनों में तेरे यामिनी की सबा
चले जब तेज़ तो हो जाए हवा।
निशिगंधा से निशि खिल उठे,
सितारों से विभावरी जगमगा उठे
बाँसुरी की धुन सुन मन झूम उठे।
इस रजनी में सजनी का मन बहके,
बेला और रजनीगंधा आँगन में महके
आधी रात में पिया को देख मुखड़ा चहके।
इस तमास्विनी में जब,
कोई सपने सुहाने बुने
नींद को पर लग जाए कई रातों तक।
निशि में ही सारी मदहोशी,
प्रेम, प्यार की बातें, मुलाकातें
सृजन शक्ति ढल जाती हैं नज़्म, गीत, कविता में।
ये रात भी बड़ी अजीब होती हैं,
कभी सुहानी, कभी भयानक
दर्द भरी एक और कथानक॥