Visitors Views 29

इंसानी भक्षक `कोरोना` बना कुत्ते-बिल्लियों का ‘रक्षक’!

अजय बोकिल
भोपाल(मध्यप्रदेश) 

*****************************************************************

आज जब हमारा देश हिंदू-मुस्लिम वायरस से बाहर नहीं निकल पा रहा,पूरी दुनिया `कोरोना` वायरस के बढ़ते प्रकोप से घबराई हुई है,भारत सहित विश्व के शेयर बाजार धड़ाम से गिर रहे हैं,कच्चे तेल के दाम नीचे जा रहे हैं,चौतरफा आशंका और अपने-आपको बचाने की चिंता है, कोरोना से बचाव के हर संभव तरीके और अधिकतम एहतियात पर जोर दिया जा रहा है,ईरान में तो बड़े राजनेता भी कोरोना की चपेट में आ गए हैं,तमाम रोकथाम की कोशिशों के बावजूद कोरोना का ‘आगे कूच’ जारी है,तो इस बीच कोरोना के ‘जनक’ चीन से खबर आई कि वहां कोरोना को थामने के लिए उठाए जा रहे कठोर कदमों के तहत देश में कुत्ते और बिल्ली का माँस खाने पर भी रोक लगा दी गई है। इसकी शुरूआत शेनजेन शहर से हो गई है। इस दृष्टि से इंसानों के लिए भक्षक बन रहा कोरोना चीन में कुत्ते-बिल्लियों के लिए ‘रक्षक’ साबित हो रहा है। वो इसलिए,क्योंकि माना जा रहा था कि इन प्राणियों के जरिए ही कोरोना वायरस फैला है।

पिछले माह सबसे पहले चीन में कोरोना के लक्षण मिले थे। जिस चीनी चिकित्सक ने इसकी सूचना दी थी,वो खुद भी कोरोना के कारण चल बसा। चीन सरकार ने शुरू में उस चिकित्सक को ही ‘झूठा’ ठहराने की कोशिश की,लेकिन उसने जो बताया था,वह न केवल सच था बल्कि अब वह भयावहता में बदल चुका है। चीन के सर्वाधिक कोरोना प्रभावित हुवेई प्रांत में ३ करोड़ लोग २ माह से अपने घरों में नजरबंद हैं। शहर सूने पड़े हैं,क्योंकि घर से बाहर न निकलना और दूसरों के संपर्क में न आना भी कोरोना को रोकने का एहतियाती उपाय है। करोड़ों लोग घरों मोबाइल एप डाउनलोड कर समय व्यतीत कर रहे हैं। दूसरी तरफ देश में मरने वालों की संख्या २७८८ तक पहुंच गई है। यह सिलसिला जारी है। इसे चीनी व्यवस्था का कमाल कहिए कि इतना सब-कुछ होते हुए भी सरकार के प्रति नाराजी का एक भी स्वर अभी तक सुनाई नहीं दिया है,या सुनने नहीं दिया गया है। इधर,भारत में कोरोना की रोकथाम के लिए सरकार ने कुछ उपाय किए जरूर हैं,लेकिन यहां मुद्दा कोरोना से ज्यादा साम्प्रदायिक हिंसा है। शायद हम मान बैठे हैं कि हिमालय की दीवार कोरोना वायरस को तो रोक ही लेगी।

इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि,कोरोना वायरस महामारी ‘निर्णायक मोड़’ पर है। इसे अभी पैनडेमिक(वैश्विक महामारी)घोषित नहीं किया गया है। फिर भी तकरीबन हर देश इससे बचने की यथासंभव कोशिश कर रहा है,क्योंकि वायरस की कोई राष्ट्रीय सीमा नहीं होती। अब तक ५५ देश इसकी चपेट में आ चुके हैं। सउदी अरब ने मक्का मदीना जैसे पवित्र शहरो में जायरीनों के आने पर रोक लगा दी है। जापान,थाईलैंड,ईरान आदि में शाला-महाविद्यालय अस्थायी तौर पर बंद कर दिए गए हैं। खुद चीनी अर्थव्यवस्था भी डगमगाने लगी है। इसका विप‍रीत असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने लगा है। भारत में इसका पहला दुष्प्रभाव तो दवा बाजार पर पड़ा है,क्योंकि जेनेरिक दवाइयां बनाने के लिए हम कच्चा माल चीन से ही आयात करते हैं।

कोरोना वायरस के इस घटाटोप में हैरान करने वाला सवाल यह भी है कि,आखिर यह जानलेवा वायरस फैला कैसे ? चीनी भी इसे अपने तरीके से खोजने की कोशिश कर रहे हैं। इन्हीं प्रयासों के तहत माँसाहार पर रोक लगाई जा रही है। वैसे चीनी क्या खाते हैं,इसके बजाए इस सवाल का जवाब देना ज्यादा आसान है कि चीनी क्या नहीं खाते ? इस बारे में एक(अतिशय) उक्ति प्रचलित है कि,चीनी वो सब(टेबल को छोड़) खाते हैं, जिनकी ४ टांगें होती हैं और वो तमाम चीजें (हवाईजहाज को छोड़)खाते हैं,जो उड़ सकती हैं। चूंकि,चीन आकार में हमसे ३ गुना और आबादी में भी बड़ा है,इसलिए वहां की खान-पान आदतें बहुत विविधता भरी और व्यापक हैं। यूँ चीनियों का मुख्य भोजन चावल और नूडल्स हैं,लेकिन गिने-चुने व्यंजन ही होते होंगे, जिनमें किसी-न-किसी प्राणी के माँस का उपयोग न होता हो। लिहाजा,जिस तरह एलर्जी में चिकित्सक क्रमश: खाद्य पदार्थों का सेवन बंद कर परिणाम देखते हैं,कुछ उसी तर्ज पर चीन में विभिन्न प्राणियों के खाने पर रोक लगा कर कोरोना के कहर को रोकने की कोशिश की जा रही है। शुरू में खबर उड़ी थी कि,कोरोना चमगादड़ खाने के कारण फैल रहा है। इसके बाद चीन में कई इलाकों में चमगादड़ भक्षण पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वहां चमगादड़ का सूप काफी लोकप्रिय है। इनके अलावा घोड़े का माँस,पोर्क(सुअर का माँस),चिकन भी खूब खाया जाता है।

इसी सदंर्भ में ताजा खबर यह आई है कि देश में कुत्ते-बिल्ली का माँस खाने पर बड़े पैमाने पर रोक लगाई जा रही है,क्योंकि कोरोना को फैलाने में इनका भी हाथ हो सकता है। दरअसल हम कुत्ते और बिल्ली को पालतू प्राणी ही मानते हैं। उन्हें प्यार से पाला पोसा जाता है। कुत्ते तो रखवाली भी करते हैं। हालांकि,हमारे यहां नागालैंड में भी कुत्ता एक महत्वपूर्ण और अनिवार्य व्यंजन है,लेकिन चीन और कुछ पूर्वी एशियाई देशों में कुत्ते खास तौर पर खाने के लिए पाले जाते हैं। चीन में तो कुत्ते-बिल्ली आपस में लड़ने से पहले ही लोगों के पेट में पहुंच जाते हैं। चीन के कई शहरों में `डाॅग मीट` मार्केट हैं। बहरहाल,चीन सरकार ने आदेश जारी‍ किया है कि शेनजेन शहर में कुत्ते-बिल्ली अब केवल पालतू प्राणी ही होंगे। यद्यपि इन प्राणियों के मारने और खाने पर यह रोक अस्थायी है। चीन में कुत्ते-बिल्लियों का यह खाद्य बाजार कितना बड़ा है,इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है ‍कि देश में १७ हजार से ज्यादा डाॅग फार्म हैं। यानी वहां बकरे की माँ से ज्यादा चिंता में कुत्तों की माँएं होती हैं। एक अनुमान के मुताबिक चीन में हर साल १ करोड़ कुत्ते और ४० लाख बिल्लियां सिर्फ खाने के लिए काटी जाती हैं।

वैसे चीनियों को कुत्ता खाना सदियों से पसंद है। इसका इतिहास ३७०० साल पुराना है,लेकिन कम्युनिस्ट क्रांति के प्रणेता माओ ने कुत्ता खाने को ‘पूंजीवादी शगल’ बताया था,जिसके कारण कई कुत्तों की जानें बच गई थीं,पर बाद में कुत्तों की मांग फिर बढ़ गई। चीन में ‘शाकाहार’ का दायरा बहुत सीमित है। चीनी शाकाहार में बांस की कोंपले,गाजर, मशरूम व मौसमी सब्जियां खाते हैं,लेकिन माँसाहार आम बात है।

जाहिर है कि,जब चीन में माँसाहार की इतनी ‘किस्म’ है तो कोरोना वायरस किसके जरिए फैला,यह पता लगाना चीनी भाषा सीखने जितना ही कठिन है। अलबत्ता एक सिद्धान्त यह भी चल रहा है कि भारतीय अपने शाकाहार के कारण ही अभी तक कोरोना से बचे हुए हैं। इस बात में कितना दम है,यह तो बाद में पता चलेगा। फिलहाल तो चीन के केंटन इलाके में प्रचलित कहावत बता दें कि-`केंटनीज सब कुछ खाते हैं,सिवाय पड़ोसी फूजियानी (फूजियान प्रांत के वासी)के।`