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जीवन का संबल ‘माँ’

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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माँ के आँचल की छाया में,
पल कर ये तन बड़ा हुआ है
माँ की उँगली पकड़-पकड़ के,
इन पैरों पर खड़ा हुआ है
देख-देख के अपने शिशु को,
माँ वारी-वारी जाती है
कौली भर के माँ बच्चे को,
निज सीने से लिपटाती है।

प्यार बरसता है आँखों से,
स्नेह सुधा बरसाती है माँ
ले गोदी पल्लू से ढक कर,
अमृत दूध पिलाती है माँ
पास बिठा कर वो दुलराती,
मिश्री दही खिलाती है माँ
नज़र कहीं से लग ना जाए,
टीका रोज लगाती है माँ।

कुछ भूला कुछ याद रह गई,
वो बचपन की प्यारी बातें
खेल-कूद कर बीते थे दिन,
खुशियों की प्यारी बरसातें
होता जब नज़रों से ओझल,
बहुत जोर घबराती थी माँ
आँखों से जलधारा बहती,
होनी से डर जाती थी माँ।

माँ बस जन्म ही नहीं देती,
जीवन भी माँ ही देती है
बच्चों के जीवन की नैया,
जब तक जीती,माँ खेती है
सहनशील धरती के जैसी,
जीवन का संबल होती माँ
विपदाओं से सदा बचा कर,
बच्चों को हरदम रखती माँ।

नहीं कोई चाहत होती है,
घर के बोझ उठाती है माँ
अपने हाथ निवाले देती,
भूखा नहीं सुलाती है माँ
कैसी भी विपदा आ जाए,
कभी नहीं घबराती है माँ
माँ काली माँ दुर्गा बन कर,
घर-परिवार बचाती है माँ
ईश्वर का प्रतिरुप है माता,
अन्नपूर्णा कहाती है माँ।

माँ तो बस माँ ही होती है,
माँ सम कोई और न दूजा
माँ के चरणों की सेवा सम,
और न कोई तीरथ पूजा
जिसके पास है माँ की दौलत,
उस जैसा धनवान नहीं है
माँ ही है भगवान जगत में,
और कोई भगवान नहीं है।

संस्कार का ज्ञान कराती,
धर्म-मर्म समझाती है माँ
जग की सारी रीत बताकर,
सत की राह दिखाती है माँ
आज बहुत ही याद आ रही,
एक बार फिर आ जाओ माँ।
फिर अपनी गोदी में लेकर,
सुख की नींद सुला जाओ माँ॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है

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