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हिंदी के समर्थन में प्रचंड जनसंख्या खड़ी करने के अंतर्राष्ट्रीय लाभ क्या ?

लीना मेहेंदले
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हिंदी पखवाड़े में एक प्रश्न बार-बार उठता है कि,क्या हिंदी कोई मौलिक भाषा है ? कितनी प्राचीन या कितनी नूतन है ? चूँकि इससे अधिक प्राचीन भाषाएं हैं,तो उनकी तुलनामें हिंदी की महत्ता कम हो जाती है,इत्यादि। साथ ही यह प्रश्न उठता है कि मैथिली को हिंदी से अलग करके एक प्रमुख भारतीय भाषा के रूप में संविधान की आठवीं अनुसूची में क्यों समाविष्ट किया गया ? यदि इसी प्रकार भोजपुरी की मांग को भी हम समर्थन देंगे तो इससे हिंदी का बहुत अधिक नुकसान होने वाला है,क्योंकि फिर अवधी, ब्रज,बुंदेली,छत्तीसगढ़ी,झारखंडी इत्यादि भाषाएं भी अपने लिए स्वतंत्र भाषा की श्रेणी चाहेंगी और इस प्रकार हिंदी की जनसंख्या घटती चली जाएगी। दूसरी ओर इन भाषाओं के बोलने वाले अपनी अपनी अस्मिता को अधिकाधिक सम्मान देने का मुद्दा बताते हैं। उनमें से कुछ इसका राजनीतिक लाभ भी देखते हैं और उस लाभ की चाहत से इस प्रकार के स्वतंत्र श्रेणी की मांग उठाते रहे हैं,आगे भी उठाते रहेंगे। इस मांग को हम रोक नहीं सकते,और यह दु:ख भी हिंदी के पक्षधरों को सालता है।
मेरे विचार में हमने प्रश्न को ही गलत तराके से समझा है। ५ हिंदी बोलने वालों में से १ कहे कि मैं तो भोजपुरी का पक्षधर या भोजपुरीभाषी हूँ तो, इससे किसको क्या लाभ और क्या हानि होती है,इसकी विवेचना पहले आवश्यक है। भारत एक विशाल देश है। अति विशालता के कारण निश्चित रुप से हमें कई प्रकार के लाभ मिलते रहे हैं और आगे भी मिलते रहेंगे। इसलिए भारत में टुकड़े गिरोह हमारे लिए अत्यंत संकट की बात होगी,इस बात को शायद हम सभी भली-भाँति समझते हैं,लेकिन जब भाषा का मुद्दा उठता है तब हमारी बुद्धि विलोपित हो जाती है। हम आज तक यह सम्यक् आकलन नहीं कर पाए हैं और ना ही जनमानस को समझा पाए हैं कि एक पूरे राष्ट्र की १४० करोड़ जनसंख्या की एक राष्ट्रभाषा घोषित होने से अंतरराष्ट्रीय व्यवहारों में हमारा पक्ष कितना अधिक प्रभावी हो जाता है।
हमारे लिए विचारणीय प्रश्न यह होना चाहिए कि,हिंदी के समर्थन में प्रचंड जनसंख्या खड़ी करने के अंतर्राष्ट्रीय लाभ क्या हैं,और उनका उपयोग कर पाने के लिए हमारे पास क्या-क्या पर्याय हैं। लाभ गिनाने हों तो चीन और उनकी भाषा ‘मंदारिन’ की ओर हमें देखना चाहिए जो संख्या बल के मुद्दे पर आज अंग्रेजी को भी मात देती है। हिंदी भी दे सकती है,लेकिन हिंदी के पक्षधरों को समझना पड़ेगा कि,कन्नड, मराठी,असमिया इत्यादि की अस्मिता बचाए बिना,बल्कि अवधी,ब्रज,बुंदेली, छत्तीसगढ़ी,झारखंडी इत्यादि की अस्मिता के बिना हिंदी को समर्थन नहीं मिलनेवाला है। और यदि इन सारी भाषाओं के साथ हम हिंदी को एकात्म भाव से जोड़ते हैं,तो हिंदी की समृद्धि अधिक तीव्र गति से होगी। इसके लिए हमें सरकारी तंत्र की कुछ परिभाषाओं को बदलना होगा। मेरे सम्मुख हर जनगणना के समय यह संकट खड़ा हो जाता है। मैं हिंदी,मराठी,बंगाली, भोजपुरी और मैथिली भली-भाँति लिख-पढ़-बोल लेती हूँ। उनके प्रति प्रेम व मालिकाना भाव रखती हूँ। जब जनगणना क्लर्क मुझे कहता है कि, आप केवल अपनी मातृभाषा का नाम लिखवाइए तो मुझे दर्द होता है कि यदि मैं किसी भी एक भाषा का नाम लिखूँ तो अन्य भाषाओं का संख्याबल बढ़ाने में मेरा कोई सहभाग मंजूर नहीं किया जाता है। यह नियमावली किसने बनाई कि,जनगणना में केवल मातृभाषा को ही पूछा जाए। इसके स्थान पर यदि पूछा जाए कि आपको ज्ञात हों ऐसी पांच भारतीय भाषाओं को आप लिखवाइए तो हमारे राष्ट्र और भाषाई एकात्मता को बहुत अधिक संबल मिलेगा। और मेरा भी उत्साहवर्धन होगा कि मैं इन भाषाओं की समृद्धि में अधिक योगदान दे सकूँ,लेकिन हिंदी के पक्षधर इस प्रकार के तकनीकी मुद्दे या तो समझते नहीं हैं या उठाते नहीं हैं।
हम न भूलें कि हर छोटी-से-छोटी भाषा का साहित्य भी उस भौगोलिक क्षेत्र के संचित ज्ञान व इतिहास का संवाहक होता है। अतः जब तक हिंदी का रोना रोने वाले अपना हृदयाकाश विस्तृत नही करते और हर छोटी-से- छोटी बोली भाषा की रक्षा के समर्थन में नहीं खड़े होते तब तक हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित कर पाना और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक अस्मितायुक्त राष्ट्र कहलवाना असंभव है। तब तक अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार में हम अंग्रेजी भाषा के गुलाम राष्ट्र ही माने जाएंगे।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई)