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जैसा बोया,वैसा ही पाओगे तुम

डॉ. वसुधा कामत
बैलहोंगल(कर्नाटक)
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‘माँ’ का दिन मनाने चले,
माँ को वृध्दावस्था में वृध्दाश्रम रख आए।
आज माँ की याद आयी,
दिखावे का मुखड़ा लगाकर
आज माँ पर हजार गीत लिखने चले।
माँ शब्द का अर्थ न जाना,
माँ पर शब्दों के फूल बरसाने चले।
माँ का रो-रो कर बुरा हाल,
राह तकते-तकते हो गया जंजाल
पर तुम कभी ना गए उसके पास,
जब तार मिला स्वर्गवास का
तो निकल पडे़ झूठे आँसूओं के साथ।
माँ की ममता को न जाना,
चले बारहवी करने
झूठे बोल और मीठी बूंदी,
माँ समान वृध्दों को बाँट आए।
क्यूँ भूल गए तुम!
एक दिन तुम भी बनोगे वृद्ध,
जैसा बोया वैसा ही पाओगे तुम।
अरे!तुम क्या जानो!
माँ क्या होती है ?
माँ तो भगवान को भी प्यारी होती है,
माँ का प्यार पाने भगवान भी तरसते हैं
माँ के आगे
तैंतीस कोटि देवता भी झुक जाते हैं।
माँ तो माँ होती है,
खुद सब-कुछ सह जाती है
बच्चों की मार भी सह जाती है,
फिर भी बच्चों के
सुख के लिए दुआ करती रहती है।
अंतिम क्षण तक अपने बच्चों को,
आर्शीवाद देती रहती है
उसके प्राण निकल जाते हैं,
लेकिन उसकी आँखें
बच्चों को सुखी देखने के लिए,
खुली ही रहती है…
आखिर माँ तो माँ ही होती है॥

परिचय-डॉ. वसुधा कामत की जन्म तारीख २ अक्टूबर १९७५ एवं स्थान दांडेली है। वर्तमान में कर्नाटक के जिला बेलगाम स्थित बैलहोंगल में आपका बसेरा है। हिंदी,मराठी,कन्नड़ एवं अंग्रेज़ी सहित कोंकणी भाषा का भी ज्ञान रखने वाली डॉ. कामत की पूर्ण शिक्षा-बी.कॉम, कम्प्यूटर (आईटीआई) सहित एम.फिल. एवं पी-एच.डी. है। इनका कार्य क्षेत्र सह शिक्षिका एवं एन.सी.सी. अधिकारी का है। सामाजिक गतिविधि के अन्तर्गत समाज में जारी गतिविधियों में भाग लेना है। इनकी लेखन विधा-कविता,आलेख,लघु कहानी आदि है। प्रकाशन में ‘कुछ पल कान्हा के संग’ है तो अनेक पत्र-पत्रिकाओं में मुक्त भाव की कई रचनाएँ आ चुकी हैं। डॉ. कामत को भगवान बुध्द फैलोशिप पुरस्कार सहित ज्ञानोदय साहित्य पुरस्कार,रचना प्रतिभा सम्मान,शतकवीर सम्मान तथा काव्य चेतना सम्मान आदि मिल चुके हैं। इनके अनुसार डॉ. सुनील परीट का मार्गदर्शक होना विशेष उपलब्धि है। लेखनी का उद्देश्य-पाठकों को प्रेरणा देना और आत्म संतुष्टि पाना है। हिंदी के कई मंचों पर हिंदी का ही लेखन करने में सक्रिय डॉ. वसुधा कामत के लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-कबीर दास जी एवं मुंशी प्रेमचंद हैं। प्रेरणापुंज-डॉ. परीट,संत कबीर दास,मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा,तुलसीदास जी एवं अटल जी हैं। आपकी विशेषज्ञता-मुक्त भाव से लिखना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“हमें बहुत अभिमान है। हिंदी हमारी जान है। हमारे राष्ट्र को अखंडता में रखना अति आवश्यक है। हिंदी भाषा ही सभी प्रांतों को जोड़ सकती है,क्योंकि यह एकदम सरल भाषा है।

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