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अपनों का साथ रखिए

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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उम्र के हर पड़ाव से कहीं ज्यादा चिंता और धोखा देने वाला बुढ़ापा होता है। जब बच्चों को हमारी जरूरत होती है, तब हम काम में इतने खो जाते हैं कि अपने ही बच्चों का मासूम चेहरा नजर नहीं आता। सारा दिन के व्यस्त जीवन से थककर बस बिस्तर के सहारे हो जाते हैं। न पत्नी का दर्द दिखता है, न यह कि उसे हमारी कितनी आवश्यकता है। न ही समय रहता है साथ बैठने का; बस रह जाती है तो पैसा कमाने की जरूरत और समय पकड़ने की परेशानी।
  अपने ही परिवार के लिए इतने परेशान हो जाते हैं, कि हमें अपनों की परेशानी ही नहीं दिखती। एक समय ऐसा आता है कि जब सब कुछ हमारे सामने ही टेबल पर रखा एकटक हमें निहारता है, पर मन ही नहीं करता कि कुछ ले सकूँ। यह वह समय होता है, जब हमारे ही बच्चे हमारे पास नहीं होते।
   एक वृद्ध शहर में अकेले रहते हैं। हाँ, वह बहुत पैसे वाले हैं। सब कुछ अच्छा है, संपत्ति है, पर जीवन नीरस है। आसपास कोई नहीं, बस नौकरों के सहारे जीवन कटता है। वह बूढ़ा व्यक्ति बीमार हुआ और एक बड़े अस्पताल में उसका इलाज चलने लगा। उसके सभी बच्चे दिल्ली में हैं, तो कोई विदेश में — सब जगह अच्छे-अच्छे पैसे कमा रहे हैं। उस वृद्ध के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। वह वृद्ध अस्पताल में पड़ा-पड़ा सभी से पूछता: “मेरा कोई बच्चा आया क्या ? मेरी बीवी, मेरी बेटी मुझसे मिलने आई क्या ?”
सामने बैठा कंपाउंडर बोल देता: “नहीं।”
  वह उदास हो जाता। शरीर बीमार होकर मौत के इतना करीब आ गया कि अब इस वृद्ध की आँखों से सिर्फ आँसू ही निकल रहे थे। आशा अपने बच्चों की, आपके दरवाजे पर टिकी है। हर धड़कन के साथ आहट कदमों की — कोई तो आ जाता।
इधर, कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। सभी आए — हवाई जहाज से। पूरा परिवार — पत्नी, बेटा, बहू, बेटी, दामाद। सब रात में कहाँ रहते, इसीलिए एक होटल में पूरा परिवार ठहर गया, पर तकदीर को तो कुछ और ही मंजूर था। सभी सो रहे थे, अचानक आग लग गई। सभी सोते रह गए, दम घुटने से सभी मर गए।सभी को कल अस्पताल में जाना था, पर वहीं दम घुटकर सब मर गए।
उधर, यहाँ बूढ़ा व्यक्ति यादों में तड़पकर मर गया। आस-पास के लोगों ने तो बस यही कहा- “बताओ, इतना धन-संपत्ति होते हुए कोई नहीं आया। और दाह संस्कार भी लोग चंदा लेकर कर रहे हैं।”
तभी टीवी पर न्यूज आई: “एक ही परिवार के सभी लोग होटल में आग लगने से झुलसकर मर गए। वह सभी अपने पिता से मिलने आए हुए थे। उनके पिता हॉस्पिटल में बीमार थे, उनका इलाज चल रहा था।”
  सभी यह समाचार देखकर सोचते रहे: “हाय रे तकदीर! न इतनी संपत्ति काम आई, और न ही अपने। साथ रह गई तो मौत, और सभी को एकसाथ समेट गई।”
इसी को कहते हैं नसीब। इसलिए
ज़िंदगी में जितना समय मिले, अपनों के साथ समय बिताना चाहिए। कौन जाने, कब कौन साथ रहे, कब साथ छोड़ जाए। सब तकदीर के हाथ में है।