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अर्जुन चौहान की ग़ज़लें समकालीन समाज का जीवंत दस्तावेज़-सिद्धेश्वर

पटना (बिहार)।

समकालीन हिंदी कविता में यदि किसी विधा ने सबसे अधिक लोकप्रियता, व्यापकता और जनस्वीकृति अर्जित की है, तो वह निस्संदेह ग़ज़ल है। फिल्मी गीतों से लेकर कवि सम्मेलनों, मंचीय प्रस्तुतियों, सोशल मीडिया और पत्र-पत्रिकाओं तक ग़ज़ल आज सबसे अधिक पढ़ी और सुनी जाने वाली काव्य-विधा बन चुकी है। अर्जुन चौहान की ग़ज़लें समकालीन समाज का जीवंत दस्तावेज़ हैं।
समकालीन हिंदी ग़ज़ल में नवचेतना, प्रयोगधर्मिता और संवेदना का सशक्त स्वर अर्जुन चौहान हैं।
    भारतीय युवा साहित्यकार परिषद एवं अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में आभासी माध्यम से आयोजित कवि सम्मेलन का संचालन करते हुए संस्था के अध्यक्ष सिद्धेश्वर ने उपरोक्त विचार व्यक्त किए। उन्होंने समकालीन कविता और ग़ज़ल की प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की।
       अध्यक्षीय टिप्पणी में अर्जुन चौहान ने कहा कि सिद्धेश्वर जी साहित्यिक और सांस्कृतिक अवदान को निरंतर सार्थक दिशा प्रदान कर रहे हैं। कोई भी रचनाकार एक दिन में निराला या प्रेमचंद नहीं बन जाता; धीरे-धीरे साधना, अध्ययन और अनुभव से उसमें परिपक्वता आती है।
    इस अवसर पर गीत-ग़ज़लों और काव्य-पाठ से सम्मेलन को ऊँचाई तक पहुँचाने वाले कवियों में प्रमुख रूप से डॉ. अर्जुन चौहान, निर्मल कर्ण, नंदकुमार मिश्र ‘आदित्य’, डॉ. अनुज प्रभात, सिद्धेश्वर तथा मनोहर भट्ट आदि शामिल रहे।