डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल
इन्दौर (मध्यप्रदेश)
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सबका संसार ‘माँ’ (‘मातृ दिवस’ विशेष)….
आज सुबह-सुबह उसे फिर माँ की याद आ गई।
…लगता है जैसे घर का सूरज ही अस्त हो गया। घर के सौन्दर्य के अभाव को तुम ही तो पूरा करती थी माँ! सुबह ६ से शुरू होने वाली तुम्हारी दिनचर्या रात ११ बजे खत्म होती थी। छोटी बहन, पिताजी, मेरे लिए सुबह उठते ही ‘लंच-बॉक्स’ तैयार करना। एक दिन पहले स्कूल की ‘यूनिफॉर्म’ देखना, गंदी हो तो रात को उसे धोना। यदि सुबह गीली मिले, तो उसे प्रेस करके सुखाना। घर की साफ-सफाई ,कपड़े-बर्तन धोना, दिनभर तुम खटती रहती थी माँ! समयाभाव के कारण जब भी तुम जल्दी-जल्दी पूजा करतीं, तो पापा हँस कर कहते थे- “हे महादेव… मेरी भागवान के पास इतना समय नहीं, कि वह श्लोक पूरे-पूरे पढ़े। उसकी गाड़ी ‘सुपरफास्ट’ भागती है। इसकी आधी-अधूरी प्रार्थनाओं पर ध्यान मत देना भगवान!” तो सभी हँस पड़ते थे। उसे उस समय भी आश्चर्य होता था और आज भी आश्चर्य होता है, कि माँ के पास इतनी ऊर्जा कहाँ से आती थी कि वह कभी थकती ही नहीं थी! उसने अपनी आँखें पोंछी। माँ उसके दिमाग से हट ही नहीं रही थी।
…..माँ तुम्हारा प्रेम निश्चल था। तुम्हारा हाथ सिर पर था, तो हमारी हर परेशानी, तनाव पल भर में दूर हो जाया करते थे। तुम्हारे आँचल की छाँव में ही मेरा स्वर्ग था। माँ… माँ… माँ… तुम क्यों चली गई ? इस पूरे संसार में तुम-सा कोई नहीं ! सचमुच जिन पर ईश्वर मेहरबान होता है, उनके साथ माँ होती है पर हाय! मेरा हतभाग्य…!
उसके जोर-जोर से रोने की आवाज सुनकर सभी उसके कमरे की और दौड़ पड़े।