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एंटीबायोटिक

राधा गोयल
नई दिल्ली
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सुमित के गाल में बहुत ज्यादा दर्द था। उनको लग रहा था, शायद दाँत में कोई तकलीफ है। कुछ भी खाया नहीं जा रहा था। गाल पर बुरी तरह सूजन भी आई हुई थी और दर्द इतना कि बर्दाश्त से बाहर था। एक निजी हाॅस्पिटल में दाँत के डॉक्टर को दिखाया। उसने कहा कि दाँत की कोई तकलीफ नहीं है। घर वापस आ गए। दर्द था कि बढ़ता ही जा रहा था। बिल्कुल भी खाया- पिया नहीं जा रहा था। अब तो यह हालत हो गई थी, कि उसके कारण बुखार भी हो गया था व जुकाम-खाँसी भी हो गई थी। बोला भी नहीं जा रहा था। किसी परिचित ने बताया कि पंजाबी बाग में फलां हॉस्पिटल में फलां का बेटा डेंटिस्ट है और बहुत काबिल डॉक्टर है। जब यह पता लगा कि जिनका उन्होंने नाम बताया, वह सुमित के भी बहुत अच्छे परिचित हैं तो सोचा कि वहाँ तो अच्छा इलाज हो ही जाएगा। इसलिए उस हॉस्पिटल में लेकर गए। वहाँ इमरजेंसी में एडमिट कर लिया। जैसा कि हर अस्पताल में होता है, वह सबसे पहले मरीज को कैन्यूला लगाते हैं और ड्रिप चढ़ानी शुरू कर देते हैं। ऐसा ही किया गया। खाँसी रोकने के लिए दवाई दे दी गई।

“डॉक्टर साहब! इनको बहुत ज्यादा दर्द हो रहा है। बोल नहीं पा रहे” पत्नी ने कहा।
“ठीक है। इनको एंटीबायोटिक दे देते हैं।”
एण्टीबायटिक की हाई डोज़ के इन्जैक्शन देने शुरू कर दिए। सब- कुछ देने के बाद भी बुखार में कोई आराम नहीं। चेहरे पर कोई हँसी नहीं। चेहरा बिल्कुल ऐसा, मानो ज़िंदगी से उदास हो गए हैं। निराश हो गए हैं। सुमित को प्राइवेट रूम की इनटाइटलमेंट थी। कमरे में शिफ्ट कर दिया गया। रोजाना अलग-अलग विभाग के डॉक्टर आते थे। उनकी पत्नी सबसे एक ही बात कहती थी कि डॉक्टर साहब जिंदगी में मैंने इतना निराश और हताश कभी नहीं देखा। इनकी इतनी बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं हो गईं। इतने बड़े-बड़े एक्सीडेंट हुए, जिनमें बचने की संभावना तक नहीं थी , लेकिन तब भी इनके चेहरे पर हँसी रहती थी। इस बार पहली बार देख रही हूँ कि इनके चेहरे पर कोई हँसी नहीं है। दूसरी बात किसी भी अस्पताल में आज तक इनकी शुगर कंट्रोल नहीं होती। मैं बार-बार बता चुकी हूँ कि घर में यह ह्यूमन मिस्टार्ड और एक्ट्रापिड का इंजेक्शन लेते हैं। यहाँ पता नहीं, कौन-सा इंजेक्शन दिया जा रहा है और कितने यूनिट दिया जा रहा है कि शुगर कंट्रोल नहीं हो रही। डाॅ सुनते थे और ‘ठीक है’ कहकर चले जाते थे, लेकिन बीमारी का निदान नहीं हुआ। एक बार भी डेंटल के डॉक्टर को नहीं दिखाया।
सुधा ने कई बार कहा- “डॉक्टर साहब ! शुरुआत में इनको दाँत में तकलीफ हुई थी, जो बढ़ते-बढ़ते पूरे जबड़े तक फैल गई और जबड़े पर सूजन आ गई थी। अभी भी आप देखिए कि कितनी सूजन आई हुई है।”
इतना कहने के बावजूद भी एक दिन भी दाँतों के डॉक्टर को नहीं दिखाया। दिन में कई-कई बार भाप देते थे और निंबुलाइज़र लगाते थे। दुनियाभर के टेस्ट कर लिए। यहाँ तक, कि कैंसर का भी टेस्ट कर लिया लेकिन दाँतों के डॉक्टर को एक दिन भी नहीं बुलाया। दस दिन तक दाखिल रहे, लेकिन हालात बद से बदतर होते रहे। जब देखा कि यहाँ कुछ नहीं होने वाला। कहीं ऐसा ना हो कि मरीज यहाँ से जिंदा वापस ही ना जा पाए, क्योंकि उन्हें तो बकरा चाहिए था, जो मिल गया था। जबरदस्ती छुट्टी दिलवाकर ले आए।
दर्द के कारण हालत बहुत ज्यादा खराब थी। पता ही नहीं लग रहा था कि दाँत की तकलीफ है या कुछ और। संयोग से घर में एक मित्र आए। उन्होंने बताया कि आपके एरिया में ही ‘एम्स’ का पढ़ा हुआ लड़का बहुत काबिल डॉक्टर है, डेंटिस्ट है। उसका नाम और फोन नंबर भी दिया। उन्होंने खुद ही उनको फोन भी कर दिया कि डॉक्टर ललित, सुमित जी मेरे बहुत अच्छे परिचित हैं। ये तुम्हें दिखाने आयेंगे तो देखकर जो भी सही लगे, वह बता देना।
डॉ. ललित से अप्वाइंटमेंट ली। उन्हें दिखाने गए। दाँत का एक्स-रे करने के बाद उन्हें समझ आ गया कि बुरी तरह से पस भरी हुई थी। कई दिन से उचित इलाज न मिलने के कारण उस तरफ की गाल की हड्डी भी गल गई थी। यदि शुरुआत में ही वह दाँत निकाल दिया जाता तो ये हालात न बनते। उन्होंने सुझाव दिया- “इसका ऑपरेशन ही करना पड़ेगा। आप फलाँ अस्पताल में दाखिल हो जाओ। आपके ऑपरेशन के लिए ४ विभागों की टीम लगेगी। १ डेंटिस्ट, १ ई.एन.टी का डॉक्टर, १ मेडिसिन का डॉक्टर और १ माइक्रोफेशियल का।”
उनसे कहा कि चारों डॉक्टर का कोऑर्डिनेशन आप खुद करना, क्योंकि कई अस्पतालों में बेवकूफ बन चुके हैं और बीमारी इस हद तक पहुँच चुकी है।
“मैं इस अस्पताल में उनके पैनल पर भी हूँ। आप चिंता मत करो। सब डॉक्टर्स से को-ऑर्डिनेट करना मेरा काम होगा।” डाॅ. ललित ने कहा।
उस अस्पताल में दाखिल हुए। वहाँ भी दोबारा से सारे टेस्ट हुए। गाल का एमआरआई और सिटी स्कैन हुआ। बताया गया कि इसका ऑपरेशन करना पड़ेगा और बहुत मेजर ऑपरेशन है। थिएटर में जब ऑपरेशन की तैयारी कर रहे थे और सामने स्कैनिंग मशीन लगाई हुई थी, तो वहाँ दाँत का सब कुछ नजर आ रहा था। सुमित के बेटे को बुलाया, उसे अस्पताल वाले कपड़े पहनाए और दिखाया कि देखो हड्डी आँख तक गल चुकी है। यह सारी निकालनी पड़ेगी। बेटे ने देखा कि वाकई हड्डी गली हुई थी। फिर सुधा भी यह सुनकर अंदर गई और कहा कि “मैं भी देखना चाहती हूँ।” उन्होंने उसे भी जाने दिया। उसने भी देखा कि हड्डी बहुत बुरी तरह सड़ चुकी थी। उन्होंने फिर जिस-जिस फार्म पर साइन करवाए, उस पर साइन कर दिए। सुधा ने कहा- “जब आप हड्डी निकालेंगे तो उसे एक बार हमें दिखा देना।”
“आप क्या करेंगे ? हमें इसका टेस्ट करवाना है।”
“मुझे केवल एक बार देखना है कि किस तरह से गली हुई है।”
“ठीक है। दिखा देंगे।”
ऑपरेशन करते समय स्क्रीन पर उन्होंने देखा कि हड्डी तो आँख तक गल चुकी है, लेकिन आँख के पास की हड्डी नहीं निकाल सकते थे। उन्होंने कहा कि सारी हड्डी निकालेंगे। आँख के पास भी गली हुई है, लेकिन वहाँ की नहीं निकाल सकते। उससे आई साइट जाने का खतरा है। वहाँ पर एक होल रह जाएगा। उसके लिए एक प्लेट बनवानी पड़ेगी, जो मुँह में ऊपर तालू में फिक्स हो जाएगी ताकि वह उस होल को ढक सके और ये कुछ खा-पी सकें।
डॉ. ललित रोज एक चक्कर जरूर लगाते थे। डॉ. ललित ने ही सभी डॉक्टरों के साथ स्वयं को-आर्डिनेशन किया था, जिसके लिए अलग से ₹ २ लाख रुपए सुमित ने जेब से दिए थे। बस यही शुक्र था कि बहुत अधिक धक्के खाने से बच गए, वरना मवाद बढ़ते- बढ़ते जहरवाद भी हो सकता था। वैसे ही शुगर बहुत हाई रहती है। शुगर वाले मरीज का तो जख्म भी आराम से नहीं भरता। ऑपरेशन के बाद उन्होंने जो हड्डी निकाली थी, वह दिखाई। वास्तव में बहुत बुरी तरह सड़ चुकी थी। उसका उन्होंने कैंसर का टेस्ट करने के लिए भेजा। भगवान का शुक्र है, कि कैंसर नहीं था।
उसके बाद ६ महीने तक लिक्विड डाइट पर रहे। लिक्विड डाइट भी नहीं ले पाते थे, क्योंकि जो होल था, उससे जो भी कुछ पीते थे, वह नाक के जरिए मुँह में आ जाता था। उसके लिए डॉक्टर ललित से ही डेंचर प्लेट बनवाई जिसके ४० हजार ₹ लगे। बाद में वही होल थोड़ा और अधिक बढ़ गया। फिर परेशानी शुरू हुई। फिर दूसरी डेंचर प्लेट बनी। उसमें दाँत नहीं लग सकते थे, जिसके कारण एक तरफ से ही कुछ खा पी सकते थे। १ साल बाद होल और भी बड़ा हो गया। फिर तीसरी बार प्लेट बनी। डॉ. ललित ने बोला- “आपको इसका ऑपरेशन ही कराना पड़ेगा, ताकि यह होल बंद हो जाए, लेकिन उस अस्पताल में आँख का इतना अच्छा डॉक्टर नहीं है।”
आखिरकार एम्स में दिखाया। कई दिन तक धक्के खाते रहे अलग-अलग यूनिट के अलग-अलग डॉक्टरों ने देखा और ऑपरेशन की डेट दे दी। वहाँ यह विश्वास था कि गलत इलाज नहीं होगा, क्योंकि वहाँ के सभी डॉक्टर काबिल और समर्पित होते हैं। सेवा भावना से काम करते हैं। जिस दिन की डेट दी थी, उस दिन वे वहाँ चले गए। पहले दिन शाम के ८ बजे से मरीज को कुछ नहीं खाना था। ऑपरेशन थिएटर में सुमित का रक्तचाप बहुत ज्यादा था। डॉक्टर ने उसको नार्मल करने की बहुत कोशिश की, लेकिन २०० से नीचे नहीं आया। सुमित ने तो कहा कि ऑपरेशन कर दो। निजी अस्पताल होता तो जरूर कर देते, लेकिन एम्स में ऐसा नहीं होता। उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया कि इतने उच्च रक्तचाप में आपका ऑपरेशन होना संभव ही नहीं है। शाम को ६ बजे उन्होंने छुट्टी कर दी, साथ ही कहा कि पहले अपना बीपी नॉर्मल कीजिए। रोजाना दवाई खाइए। रोजाना बीपी देखिए। उसके बाद यहाँ आकर फिर दोबारा से आपके सारे टेस्ट होंगे और तब आपको ऑपरेशन की डेट देंगे, लेकिन धक्के खा-खाकर इतने थक चुके थे कि अब डॉक्टर ललित से ही हर बार जबड़े की प्लेट बनवा लेते हैं। जो होल बढ़ जाता है, वह उसके लिए बंद करने के लिए भी प्लेट में ही इस तरह से कुछ लगा देता है ताकि खाने-पीने में मुश्किल ना हो। हालांकि, थोड़ी-सी मुश्किल अब भी होती है लेकिन वह बर्दाश्त के लायक है।
यदि उस हॉस्पिटल में लेकर न जाते तो शायद ना तो हड्डी इस तरह से गलती, ना ही इस तरह से ऑपरेशन की नौबत आती, और ना ही इस तरह की ज़िंदगी जीनी पड़ती, जिस तरह की जिंदगी अब जी रहे हैं।
तो यह हुआ एंटीबायोटिक से, जिसका बाजार खूब पुष्पित एवं पल्लवित है। जरा-सा जुकाम हो, दे दो एंटीबायोटिक। खाँसी हो, लिख दी एंटीबायोटिक।
बुखार हो, लिख दी एंटीबायोटिक। अरे! जहाँ जरूरी है, वहाँ तो समझ में आता है कि एंटीबायोटिक दवा जरूरी है; लेकिन जहाँ जरूरी नहीं है, वहाँ भी जबरदस्ती एंटीबायोटिक दवा देना। भला कहाँ का इंसाफ है भई ? एक समय ऐसा भी आता है जब एंटीबायोटिक दवा खाते-खाते वह दवा असर करना ही बंद कर देती है और जिस बीमारी को दूर करने के लिए मरीज दवाई खाता है, वह बीमारी इतनी अधिक बढ़ जाती है कि काबू में आनी मुश्किल हो जाती है।