अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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पैसे की चमक के पीछे भागता आज का समाज एक अजीब-सी अंधी दौड़ का हिस्सा बन चुका है। सुबह की पहली किरण से लेकर रात के अंधेरे तक इंसान सिर्फ एक ही धुन में भाग रहा है-पैसा, तरक्की, और सुख-सुविधाएं। इस आधुनिकता की चकाचौंध में हमने भौतिक रूप से तो बहुत विकास कर लिया है, लेकिन मानसिक और भावनात्मक रूप से हम लगातार कंगाल होते जा रहे हैं। आज की सबसे बड़ी विडंबना यानी तकलीफ यह है कि हमने ‘चीजों’ से प्यार करना शुरू कर दिया है और ‘इंसानों’ का इस्तेमाल, जबकि नियम इसके बिल्कुल उलट होना चाहिए था। जीवन का असली संतुलन अर्थात तालमेल तभी संभव है, जब पैसे से ऊपर उठकर इंसान और रिश्तों की कद्र करना सीखें। यक़ीनन पैसा आवश्यक है, जीवन जीने का एक बेहद जरूरी साधन है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। यह हमें अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, आरामदायक घर और समाज में एक स्थान दिलाता है, लेकिन हमें यह तो समझना होगा ना कि पैसा सिर्फ एक ‘साधन’ है, ‘साध्य’ नहीं। पैसा आपकी जेब तो भर सकता है, लेकिन आपके दिल का खालीपन नहीं मिटा सकता। आप पैसों से दुनिया का सबसे महंगा और आरामदायक बिस्तर तो खरीद सकते हैं, लेकिन उस पर आने वाली चैन की नींद नहीं खरीद सकते। नींद के लिए मन का सुकून चाहिए, अपने लोग साथ चाहिए, और मन का सुकून तब मिलता है जब आपके पास आपकी परवाह करने वाले लोग हों।
दरअसल, किसी भी समाज या दुनिया में रिश्तों की बुनियाद कभी भी आर्थिक हैसियत पर नहीं टिकी होती है। जो रिश्ते भविष्य के स्वार्थ एवं पैसों की चमक देखकर बनते हैं, उनकी उम्र बहुत छोटी होती है। जैसे ही धन-दौलत और पद का स्तर नीचे गिरता है, वैसे ही वे रिश्ते भी ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं। इसके विपरीत, जो रिश्ते आपसी समझ, सम्मान और नि:स्वार्थ प्रेम पर बनते हैं, वे वक़्त के हर थपेड़े को झेल जाते हैं। एक सच्चा इंसान और एक मजबूत रिश्ता आपकी ज़िंदगी का वह सुरक्षा कवच है, जो संकट के समय सबसे पहले आगे आता है।
निश्चित ही एक कड़वा सच यह भी है कि जब ज़िंदगी में कोई बड़ी मुसीबत आती है, या हम जीवन के आखिरी पड़ाव पर होते हैं, तब हमारा बैंक बैलेंस या हमारी गाड़ियाँ हमसे बात करने नहीं आतीं। उस वक़्त हमारा हाथ थामने के लिए, हमें ढांढस बंधाने के लिए और हमारी आँखों के आँसू पोंछने के लिए सिर्फ एक इंसान ही खड़ा होता है; भले ही फिर वो दोस्त हो, भाई हो या जीवनसाथी।
आज के दौर में रिश्तों में बिखराव की सबसे बड़ी वजह यही है, कि लोग इंसान की कीमत उसके चरित्र, व्यवहार और ईमानदारी से नहीं, बल्कि उसकी आमदनी और रुतबे से लगाने लगे हैं। शादियां हों, दोस्ती हो या कोई अन्य सामाजिक संबंध, हर जगह सबसे पहले ‘फायदा’ देखा जाता है। इस व्यावसायिक सोच ने हमारी संवेदनाओं, अपनेपन एवं प्रेम को खत्म कर दिया है। हम यह भूल जाते हैं कि तिजोरी में बंद नोट कभी हँस नहीं सकते, वे कभी दु:ख में गले लगाकर यह नहीं कह सकते कि “चिंता मत करो, मैं तुम्हारे साथ हूँ।”, जबकि यह भरोसा सिर्फ एक इंसान यानी कोई अपना ही दे सकता है।
यदि हम मन को खुला करके गहराई से सोचें, तो साफ समझ में आएगा कि पैसा आज है और कल नहीं भी हो सकता है। अमीर से अमीर व्यक्ति भी वक़्त के चक्र में गरीब हो सकता है तो आर्थिक रूप से गरीब भी मेहनत से अमीर बन सकता है, लेकिन खोया हुआ भरोसा, टूटा हुआ दिल और बिछड़ चुके सच्चे लोग दोबारा कभी वापस नहीं आते। हम पैसों के पीछे भागते-भागते अक्सर उन लोगों को नजरअंदाज कर देते हैं, जो हमारे लिए वास्तव में मायने रखते हैं। पैसे के घमंड में जब तक हमें अपनी गलती का एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और हाथ में सिर्फ पछतावा व अकेलापन रह जाता है; अपने छूट जाते हैं।
इसलिए, समय रहते अपनी प्राथमिकताओं को बदलना बेहद जरूरी है। हमें मशीन बनने की इस होड़ से खुद को बाहर निकालना होगा। अपने काम और व्यापार के साथ-साथ अपने परिवार, दोस्तों और शुभचिंतकों को भी वक़्त देना सीखें। किसी व्यक्ति से जुड़ते समय उसकी तिजोरी का आकार न देखें, बल्कि उसके दिल की गहराई और उसके संस्कारों को देखें।
कुल मिलाकर जीवन की सार्थकता इस बात में नहीं है, कि दुनिया से जाने के बाद आपने पीछे कितना बैंक बैलेंस छोड़ा, बल्कि इस बात में है कि आपकी गैर-मौजूदगी में कितने दिलों ने आपको सच्चे मन से याद किया। पैसा कमाना जरूरी है, लेकिन इंसानियत और रिश्तों को दांव पर लगाकर नहीं। जब आप इंसान को अहमियत देना शुरू करेंगे, तो जिंदगी खुद-ब-खुद खूबसूरत, शांत और संतोषजनक बन जाएगी। भले ही कम लोग होंगे, पर अपने होंगे और साथ निभाने वाले मिलेंगे।