नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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दूरियाँ दिलों को जोड़ती हैं या तोड़ती हैं,
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिस पर अलग-अलग विचार हैं।
अक्सर लोग मानते हैं कि दूरियाँ रिश्तों में खटास लाती हैं,
पर वास्तव में विश्वास और संवाद की कमी ही रिश्तों को तोड़ती है।
दूरी बढ़ने से प्रेम में संदेह जन्म ले सकता है,
दिल धड़कता तो है, पर ममता और गहरी हो जाती है।
मिलन की चाहत एक अनमोल छवि मन में बसाती है,
फिर कौन कहता है कि दूरी बढ़ने से दिल टूटता है।
हर पल उनका दीदार मन की आँखों में होता है,
वही चेहरा, जो अपार खुशी देता था।
जब पास थे, तो खुशियाँ बरसात-सी लगती थीं,
दूर जाने पर उनकी यादों का अम्बार हो जाता है।
कितने सपने उन्होंने दिए, कितनों को विस्तार मिला,
कौन कहता है कि दूरी बढ़ने से दिल तार-तार टूटता।
यदि दूरी न होती, तो चाँद इतना प्यारा न लगता,
दूरी के कारण ही तारे और सुंदर दिखते हैं।
दूरी प्रेम के मर्म को समझाती है, दिलों को जोड़ती है,
फिर कौन कहता है, कि दूरी बढ़ने से दिल टूटता है।
वीर सैनिक जब दूर देश की सीमा पर रहता है,
तब भी माँ-पिता और भाई-बहन का प्रेम कम नहीं होता।
लोग मन्नत माँगते हैं, प्रार्थना करते हैं,
और ऐसे देशभक्तों के प्रति अपना प्रेम प्रकट करते हैं।
फिर कौन कहता है, कि दूरी बढ़ने से दिल टूटता है,
दूरी दिलों को नहीं तोड़ती, बल्कि यादों के सहारे और गहराई से जोड़ती है।
भावनाएँ यदि सच्ची और पवित्र हों,
तो दूरी किसी रिश्ते को समाप्त नहीं कर सकती।
जब दोनों पक्ष प्रतिबद्धता और समझ को नहीं मानते,
तो नज़दीकियाँ भी रिश्तों को बना नहीं सकतीं,
और जब आपसी संबंध विश्वास पर टिके होते हैं,
तो दूरियाँ भी ऐसे रिश्तों को नहीं तोड़ पातीं॥