कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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जिंदगीभर भ्रम में रहा,
जीवन में सदा अकेला रहा।
ज़िंदगी खत्म हो गई, रहा कुछ नहीं,
दौलत संभाल ली, पर ले गया कुछ नहीं।
ज़िन्दगीभर अहंकार हुआ, अहंकार से मन भारी रहा,
छोड़ दो ना अपनों के लिए, मैं चला भ्रम में भरा हुआ।
छोड़ देते अहंकार को, सदा मन अहंकारी हुआ।
ज्ञानी पिता ने संस्कार दिए, दिख रहा-हरण, कहाँ हुआ।
झुक कर रहता, जीवन जीता, लुटता रहा गरीबों का अंश।
दोस्तों के साथ कहाँ अच्छा किया,
अपनों के साथ कुछ अच्छा किया करो।
सादा जीवन, उच्च विचार,
खत्म करो अब तो अहंकार॥