सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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आज़ादी… और आज हम (१५ अगस्त विशेष)…
शुभ घड़ी है, शुभ दिवस है
राष्ट्र का संदर्भ है,
आइए इस पर्व पर
कुछ काम की बातें करें।
स्वतंत्रता दिवस के ७९ वर्ष बीत चुके, देखने की और सोचने की बात यह है कि इस बात का विश्लेषण करना चाहिए कि कहाँ हमने ध्यान नहीं दिया। जिन क्षेत्रों में प्रगति हो रही है, ठीक है, पर जहाँ हम पीछे रह गए हैं, उधर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है।
पिछले ८० वर्ष में भारत ने वो कर दिखाया जिसे दुनिया ‘असंभव’ कहती थी। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र न सिर्फ बचा, बल्कि जवान हुआ। हर ५ साल में सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण हमारी सबसे बड़ी ताकत बना, पर शायद हम आज़ादी का अर्थ ठीक से समझ नहीं पाए। आवश्यकता है समझने की, कि आज़ादी है क्या ?
हमारी भाषा, संस्कृति व संस्कारों में निरंतर पतन देखने को मिल रहा है।भारत को तो विश्व गुरु बनना है,
अतः आवश्यक सुधार वांछनीय हैं।
आज़ादी केवल एक शब्द नहीं, बल्कि अनगिनत बलिदानों से अर्जित वह अमूल्य धरोहर है, जिसकी कीमत हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर चुकाई। १५ अगस्त १९४७ को भारत ने लंबे संघर्ष के बाद अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति पाई। यह दिन हमारे लिए गर्व, सम्मान और आत्मचिंतन का दिन है। आज हम स्वतंत्र भारत में साँस लेते हैं, अपने विचार व्यक्त करते हैं और अपने सपनों को पूरा करने का अवसर पाते हैं।
१५ अगस्त २०२७ को हमारी आज़ादी के ८० वर्ष पूरे होंगे। ८० साल में भारत ने राजशाही से लोकतंत्र, अकाल से खाद्यान्न आत्मनिर्भरता और साइकिल से चंद्रयान तक का सफर तय किया। विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, कृषि, चिकित्सा और अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। आज का भारत आत्मनिर्भर बनने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है, मगर केवल स्वतंत्र होना ही पर्याप्त है ? आजादी के साथ हमारी जिम्मेदारियाँ भी बढ़ जाती हैं। हमें जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के नाम पर होने वाले भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देनी चाहिए। हमें संविधान का सम्मान करना चाहिए, अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों को भी समझना चाहिए। स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, ईमानदारी, अनुशासन और दूसरों के अधिकारों का सम्मान—ये सभी सच्ची स्वतंत्रता के आधार हैं।
यह कविता कुछ कहती है, उसे भी सुन लेते हैं-
है यही अब सोचना,
हम काम ऐसा कुछ करें
चाहिए अधिकार तो
कर्त्तव्य की बातें करें।
संभावनाओं को करें पोषित,
नये संकल्प हों
उज्ज्वल भविष्य है देश का
इसका न कोई विकल्प हो।
महात्मा गांधी ने कहा था- “आज़ादी तब होगी, जब आखिरी व्यक्ति की आँख का आँसू पोंछा जाएगा।”
क्या आज भूख, बेरोजगारी, अशिक्षा और भेदभाव पूरी तरह मिटे ? क्या हमने विकास के साथ संस्कार और तकनीक के साथ करुणा भी बचाकर रखी ?
शहर चमक रहे हैं, पर गाँव साँस ले रहे हैं। स्क्रीन बड़ी हुई हैं, पर संवाद छोटे। अस्सी साल में हमने फैक्ट्री भी बनाई और भजन भी। मिसाइल भी बनाई और मिट्टी का दीया भी।
हमने दुनिया को योग दिया और दुनिया से स्वार्थ भी सीखा।
सम-सामयिक हमें दौड़ाता है- “आगे बढ़ो, और तेज़”। संस्कार हमें रोकता है- “रुको, मुड़कर देखो पीछे कौन छूट गया”।
श्रेष्ठ देश वही है, जो दोनों की सुनता है।

आगे का रास्ता:अमृतकाल से शताब्दी तक-
अगले २० साल में हमें ‘शताब्दी’ मनानी है। इसके लिए ३ संकल्प जरूरी हैं:

विकसित भारत – आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, पर पर्यावरण का दोस्त

सक्षम भारत – हर हाथ को काम, हर बच्चे को शिक्षा, हर मरीज को इलाज

संस्कारी भारत – जहां प्रगति हो, पर जड़ें न कटें। जहाँ मोबाइल हो, पर ‘माँ’ भी हो।
आज जब हम आज़ादी का उत्सव मनाते हैं, तब हमें स्वयं से यह प्रश्न भी करना चाहिए कि हम अपने देश के लिए क्या कर रहे हैं। पूर्वजों ने हमें स्वतंत्र भारत सौंपा; अब इसे मजबूत, समृद्ध, शिक्षित और संवेदनशील बनाना हमारी जिम्मेदारी है। सच्ची आज़ादी तभी सार्थक होगी, जब देश का प्रत्येक नागरिक सुरक्षित, सम्मानित और आत्मनिर्भर हो। इसलिए आज़ादी का अर्थ केवल बंधनों से मुक्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के साथ अपने राष्ट्र को बेहतर बनाने का संकल्प भी है। यही ‘आज़ादी और आज हम’ का वास्तविक संदेश है-
करता है विश्वास भारत,
युवा देश के सजग हों
करें क्षमता का प्रदर्शन,
कार्य सारे सुगम हों।