डॉ.विद्यासागर कापड़ी ‘सागर’
पिथौरागढ़(उत्तराखण्ड)
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बूढ़े जन का घर में,
जीते-जी कर मान।
मर जाने पर उनके,
क्या तर्पण क्या दान॥
बल है देवों का ही,
उनकी हर आशीष।
चरण कमल में उनके,
सदा झुकाना शीश॥
चुन-चुनकर तिनकों को,
बुना बनाया गेह।
उनसे ही है घर में,
खुशहाली की मेह॥
बूढ़े ही हैं घर की,
सकल सुखों की खान।
बूढ़े जन हों घर में,
जीते-जी कर मान…॥
वो तो घर के वट हैं,
हम छोटी-सी डाल।
आता है जब दु:ख तो,
बन जाते हैं ढाल॥
उनके होने भर से,
घर में रहता मोद।
बचपन में हम खेले,
कूद सदा ही गोद॥
उनसे ही है जो भी,
है अपनी पहचान।
बूढ़े जन हों घर में,
जीते-जी कर मान…॥
वे विपदा के हल हैं,
सदा दिखाते राह।
उनके उपकारों की,
कहाँ मिलेगी थाह॥
बिना बताये पढ़ लें,
आँखों के सब बोल।
मिली आँधियाँ तो भी,
हुये न डाँवाडोल॥
सींच गये वो तब ये,
दिखते मनहर गान।
बूढ़े जन हों घर में,
जीते-जी कर मान…॥
कितनी कमियाँ घर की,
ढककर दिया प्रकाश।
सच में तो वो ही हैं,
इन अधरों के हास॥
धुरी हमारे घर की,
वो हैं मालाकार।
होता है पूरा तो,
उनसे ही परिवार॥
थे वो खड़े तपन में,
शीतल छाता तान।
बूढ़े जन हों घर में,
जीते-जी कर मान…॥
मर जाने पर उनके,
क्या तर्पण क्या दान।
बूढ़े जन हों घर में,
जीते-जी कर मान…॥