अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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किसी भी कालखंड में लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनाव कराने, सरकारें बनाने और सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है। उसकी वास्तविक ताकत इस बात में निहित है, कि प्रत्येक पात्र नागरिक यानी आम आदमी को बिना किसी परेशानी यानी बाधा के अपने मताधिकार का प्रयोग करने का अवसर मिले। मतदान का अधिकार नागरिक को शासन व्यवस्था में भागीदारी का अवसर देता है और सरकारों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है। इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता जितनी आवश्यक है, उसमें प्रत्येक योग्य आम आदमी (नागरिक) का नाम शामिल होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर देश में चल रही बहस ने इस विषय को लोकतंत्र के केंद्र में ला दिया है।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहाँ मतदाता सूची तैयार करना तथा उसे अद्यतन रखना एक विशाल प्रशासनिक कार्य है। निर्वाचन आयोग के अनुसार फरवरी २०२४ में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में देशभर के करीब ९६.८८ करोड़ मतदाता पंजीकृत थे। इनमें करीब ४७.१५ करोड़ महिला और ४९.७२ करोड़ पुरुष मतदाता शामिल थे। यह आँकड़ा बताता है, कि भारत में चुनावी प्रक्रिया कितने बड़े स्तर पर संचालित होती है। वर्ष २०२४ के लोकसभा चुनाव में लगभग ६४.६४ करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया और कुल मतदान प्रतिशत ६६.१० रहा। इतने विशाल लोकतंत्र में मतदाता सूची की विश्वसनीयता बनाए रखना निर्वाचन व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं की प्रविष्टियों को ठीक करना, दोहरी प्रविष्टियों की पहचान करना और नए पात्र नागरिकों को सूची में शामिल करना है। इस प्रक्रिया से चुनावी व्यवस्था अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बन सकती है, लेकिन किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए, कि कितने नाम हटाए गए, बल्कि इससे भी कि कितने पात्र नागरिकों का अधिकार सुरक्षित रखा गया। सूची को त्रुटिरहित बनाने के प्रयास में यदि किसी वास्तविक मतदाता का नाम छूट जाता है, तो उसका प्रभाव केवल १ व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता; लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व भी प्रभावित होता है।
निर्वाचन आयोग के आँकड़ों के अनुसार देशव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान लगभग ९५.४० करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड की समीक्षा की गई। आयोग ने १३.३९ करोड़ प्रविष्टियों को अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत अथवा दोहरी प्रविष्टियों जैसी श्रेणियों में रखा। आयोग के वर्गीकरण के अनुसार, इनमें लगभग ६.३० करोड़ स्थायी रूप से स्थानांतरित, ३.०१ करोड़ अनुपस्थित या पता नहीं चल पाने वाले, २.८० करोड़ मृत और १.०२ करोड़ दोहरी प्रविष्टियों वाले मतदाता शामिल थे। इन आँकड़ों के बीच यह अंतर समझना जरूरी है, कि संबंधित श्रेणियों में प्रविष्टियों की संख्या और अंतिम रूप से हटाए गए नामों की संख्या हमेशा एक ही बात नहीं होती। आयोग ने पात्र मतदाताओं को छूटे हुए नामों के लिए आवेदन करने का अवसर देने की भी बात कही है।
इसे यूँ समझिए कि यहीं इस पूरी प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी सामने है। किसी मतदाता का पता बदल गया हो, वह काम के कारण दूसरे शहर में रहता हो या सत्यापन के समय अपने घर पर उपलब्ध न हो, तो केवल इन परिस्थितियों के आधार पर उसके मताधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। अर्थात नाम नहीं काटा जाना चाहिए। इसी प्रकार, दस्तावेजों में अंतर या पारिवारिक विवरण में कोई गलती मिलने पर भी उचित सत्यापन और संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का अवसर अवश्य मिलना चाहिए। तकनीक और डिजिटल रिकॉर्ड प्रशासनिक कार्यों को आसान बना सकते हैं, पर आप मानवीय परिस्थितियों को समझने और वास्तविक स्थिति की पुष्टि करने की आवश्यकता समाप्त नहीं कर सकते।
इतना ही नहीं, इस विषय पर राजनीतिक दलों और नागरिक समूहों की चिंताओं को भी गंभीरता से सुना जाना चाहिए। अगर निर्वाचन आयोग का दायित्व मतदाता सूची को शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है, तो प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।
अक्टूबर २०२६ में कर्नाटक की मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में प्रविष्टियों के सत्यापन और नाम हटाए जाने को लेकर बहस हुई। यह उदाहरण बताता है, कि व्यापक स्तर पर होने वाली ऐसी प्रक्रिया में स्पष्ट नियम, पर्याप्त सूचना, शिकायतों के निपटारे और अपील की प्रभावी व्यवस्था कितनी जरूरी है। किसी भी आरोप को बिना प्रमाण के अंतिम सत्य नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन आमजन की आशंकाओं का तथ्यपूर्ण उत्तर देना भी संस्थागत जवाबदेही है। इसे ‘फिजूल’ कहकर आयोग छोड़ नहीं सकता।
इस दिशा में कुछ व्यावहारिक कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जिसमें मतदाता सूची के प्रारूप व अंतिम प्रकाशन की जानकारी स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध कराई जाए। जिन लोगों के नाम हटाने का प्रस्ताव हो, उन्हें समय रहते सूचना दी जाए और आपत्ति दर्ज कराने के लिए पर्याप्त अवसर मिले। बूथ स्तर के अधिकारी जरूरतमंद, बुजुर्ग, दिव्यांग और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों तक पहुंचें। शिकायतों के निस्तारण की समयसीमा निर्धारित हो तथा प्रत्येक निर्णय का उचित रिकॉर्ड रखा जाए। राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों को भी सत्यापन प्रक्रिया में रचनात्मक सहयोग करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि हर मतदाता स्वयं भी समय-समय पर अपना नाम और विवरण जांचने के प्रति जागरूक रहे।
राजनीतिक विरोध जितना भी हो, पर यह बात तो स्पष्ट है कि लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल नामों और संख्याओं का सरकारी दस्तावेज नहीं है। यह नागरिक और शासन व्यवस्था के बीच राजनीतिक भागीदारी का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसकी शुद्धता चुनाव की निष्पक्षता के लिए आवश्यक है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता तभी कायम होगी, जब हर पात्र नागरिक का अधिकार भी पूरी तरह सुरक्षित रहे। इसलिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित करने की बजाय पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही के आधार पर आगे बढ़ाना चाहिए। लोकतंत्र की वास्तविक सफलता केवल गलत प्रविष्टियाँ हटाने में नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि कोई भी योग्य नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रह जाए। आखिरकार, मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव की विश्वसनीयता की नींव है और हर पात्र नागरिक का मताधिकार उस लोकतंत्र की आत्मा है, जिसकी रक्षा करना सबकी साझा जिम्मेदारी है।