कुल पृष्ठ दर्शन : 2

जीना तो पड़ता है

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
*******************************

दुनिया के इस ‘मेले’ में, 
चलना तो ‘पड़ता’ है राही
मुश्किलें हजारों आती है,
पर भूले-बिसरे ‘पलों’ के साथ 
जीना तो पड़ता है।

सफ़र तो हर ‘कोई’ करता है यहाँ,
पर बहुत कम ‘लोग’ चल पाते हैं
जीवन के इस टेढ़े-मेढे ‘रास्तों’ पर,
लेकिन हमें ‘भूले-बिसरे’ पलों के साथ जीना तो पड़ता है।

रुकना या हार मान ‘जाना’ ठीक नहीं,
क्यों डरना-कभी खुशियों के पल, कभी गमों के साये
ज़िन्दगी की ‘रफ्तार’ को दुनिया से जोड़ों और जियो,
क्योंकि हमें तो ‘भूले-बिसरे’ पलों के साथ जीना तो पड़ता है।

दुखों के ‘अन्धकार” के बाद फिर उम्मीदों की किरणें आएगी,
दम तोड चुकी तुम्हारी ‘पथरीली’
आँखें पर भरोसा अब भी है।
जीना इसी का नाम है, और ‘यादें’ हमें आगे बढ़ते रहने की बात कहतीं हैं,
क्योंकि दुनिया में ‘भूले-बिसरे’ पलों के साथ ही तो जीना पड़ता है॥