पटना (बिहार)।
न्याय में हिंदी के लिए संघर्षरत अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद ने बताया कि बार-बार मना करने के बाद भी वे हिंदी में ही आवेदन दाखिल करते आ रहे हैं, जिसका उद्देश्य हिंदी को उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों की भाषा बनाना है, जिसे लुका-छिपा कर उनके विरुद्ध कुछ झूठा आरोप गढ़ा गया है और बिना सुनवाई का मौका दिए हुए उन्हें महाधिवक्ता कार्यालय बिहार से निकल बाहर किया गया है। और अब उनको वकालत खाने से भी निकाल बाहर करने का षड्यंत्र रचा गया है।
उसी षड्यंत्र के अंतर्गत परिवाद पत्र संख्या -१/२०२५ महाधिवक्ता कार्यालय बिहार बनाम इंद्रदेव प्रसाद दर्ज हुआ है, जो बहुत भारी खर्च के साथ खारिज होने के लायक है, जिसके अभिलेख में हेर-फेर करके प्रभावहीन निलंबन आदेश दिनांक २१.५.२०२५ को प्रभावी बनाया गया है, जिसका उद्देश्य राज्यपाल बिहार के आदेश से निर्गत विधि विभाग की अधिसूचना संख्या सी./ई.एच-३८ २००-४४२१ जे. पटना दिनांक २० जुलाई, २०१६ क्रि.डब्लू.जे.सी संख्या-४३५/२०१५ कृष्णा यादव बनाम बिहार राज्य एवं अन्य में पारित पूर्णपीठ का निर्णयादेश दिनांक ३०.४.१९, मंत्रिमंडल सचिवालय बिहार की बैठक (दिनांक-१९.९. २०२३) का स्वीकृत प्रस्ताव संख्या ३४ के लाभों से उनको वंचित करना है और फर्जी पदमुक्ति आदेश ज्ञापन संख्या ३३९७ जे.पटना (दिनांक २८.५.२४) के फर्जीवाड़ा को दबाना है। उनको पुन: विधि पदाधिकारी बनने से रोकना है और भारत संघ की राजभाषा हिंदी के विकास को रोकना है, जिससे हिंदी वर्गों एवं अंग्रेजी वर्गों के बीच घृणा /शत्रुता /वैमस्यता फैल रहा है और उसका बुरा प्रभाव राष्ट्रीय अखंडता पर पड़ रहा है, जो संगेय अपराध के अंतर्गत आता है ,जिस पर सुसंगत आपराधिक धाराओं के अंतर्गत प्रथम सूचना रिपोर्ट का पंजीकरण आज्ञापक है ,जो २०१४ (३)सीसी एससी १५८९(एस.सी.) ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्न की कंडिका १११ को पढ़ने से लोगों को भी प्रतीत हो रहा है। प्रजातांत्रिक देशों में लोगों की इच्छा सर्वोपरि होती है, जिसकी पूर्ति के लिए उन्होंने उपरोक्त संगेय अपराध की लिखित सूचना सी.बी.आई. निदेशक को उनके पोर्टल एवं ईमेल आईडी पर दी है और आदेशानुसार सी.बी.आई. शाखा प्रमुख, पटना प्रांजल रुंगला के समक्ष उपस्थित होकर उनके द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर भी दिया है, जिसके परिप्रेक्ष्य में उन्होंने केंद्रीय सरकार या सक्षम न्यायालय से जांच आदेश लाने का सुझाव दिया हैं, जिसे मानकर वे जांच आदेश देने का आग्रह राष्ट्रपति भारत, प्रधानमंत्री भारत एवं कार्मिक सचिव ,कार्मिक विभाग (भारत सरकार नई दिल्ली) से किए हैं, जिसका रजिस्ट्रेशन नम्बर पीएम ओपीजी/ई/२०२६/०१०१६२०) है।
विधि विभाग की उक्त अधिसूचना दिनांक २० जुलाई २०१६ से उनकी नियुक्ति विधि पदाधिकारी स्थाई समुपदेशक संख्या २७ के पद पर सरकारी मुकदमों का संचालन करने के लिए हुई है। वे दिनांक २५.७. २०१६ को महाधिवक्ता कार्यालय (बिहार) में अपने पद पर योगदान दिए हैं और विधि की दृष्टि में उस समय से लगातार अभी तक अपने पद पर बने हुए हैं। दिनांक १६.४. २०२४ को उनको महाधिवक्ता कार्यालय बिहार से निकाल बाहर किया गया है। निकाल बाहर करने के पूर्व उनसे कोई कारणपृक्षा नहीं पूछी गई है। उन्हें सुनवाई का कोई मौका भी नहीं दिया गया है। उन्हें पदमुक्ति का कोई आदेश भी नहीं दिया गया था, जिसका आपराधिक मुकदमा भी सक्षम न्यायालय में चल रहा है, जिसके न्यायिक कार्यवाहियों में और उक्त सीबीआई परिवाद पत्र के न्यायिक कार्यवाहियों में उक्त पदमुक्ति आदेश मिला है, जो घटना तिथि १६.४.२०२४ के बाद का है और उसमें अंकित राज्य सरकार का आदेश फर्जी है, जो सीडब्लूजेसी संख्या १३१९८/२०२५ में चुनौती के अधीन है, जिसकी सुनवाई दिनांक २२/६/२०२६ को होने वाली है।
उनका कहना है कि सतयुग में भी सत्य की जीत अंत में होती थी और इस कलयुग में भी अंत में सत्य की ही जीत होती है, सिर्फ कानून को साथ लेकर लगातार चलते रहने की जरूरत है।
भवदीय
इंद्रदेव प्रसाद
(अधिवक्ता सह विधि पदाधिकारी,
स्थाई सलाहकार संख्या -२७
पटना उच्च न्यायालय)
(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुम्बई)