राधा गोयल
नई दिल्ली
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किसी ने कहा है-
इंसान बनो, कर लो भलाई का कोई काम
दुनिया से चले जाओगे, रह जाएगा बस नाम।
लाखों लोग यहाँ शान अपनी दिखाते हुए आए थे। सोचा था कि दुनिया को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेंगे, सब पर अपनी धाक जमा लेंगे, दुनिया की सारी दौलत हमारी है… लेकिन हुआ क्या ?
सिकंदर भी आए, कलंदर भी आए, लेकिन क्या कोई रहा ? सभी मर गए। दौलत भी यहीं पड़ी रह गई। उनके जुल्मों-सितम को याद करके दुनिया आज तक उन्हें कोसती है। बर्बर हूण, शक, यवन, अंग्रेज इस देश की दौलत लूटने के लिए आए, किंतु क्या कुछ नाम कमा कर गए ? सच्चाई यह है कि बदनाम हुए। हाँ…, कुछ लोगों की आदत होती है
वह सोचते हैं बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ…।
अरे, तुम्हें मानव योनि में जन्म मिला है जो बहुत मुश्किल से मिलता है। मानव हो तो मानवता के हित के लिए कुछ तो ऐसे नेक काम करो, जिन्हें दुनिया याद रखे।
यह कहावत सभी ने सुनी होगी-
वृक्ष कबहुँ न फल भखें, नदी न चख्यो नीर,
परमारथ के कारणे, धारण कियो शरीर।
यह मानव चोला बड़ी मुश्किल से मिलता है। अच्छा है कि इस जीवन को नेक काम में लगाओ; क्योंकि धन-दौलत तो सब यहीं रह जानी है। दुनिया को केवल यह याद रहना है, कि तुमने इस धरा-धाम पर आकर क्या नेक काम किया।
जो आजकल भगवान की तरह पूजे जाते हैं, या जिनका नाम है, वह ऐसे ही नहीं हुआ था। उन्होंने औरों के हित की खातिर बहुत कुछ बलिदान किया था। फिर चाहे वह हमारे वीर क्रान्तिकारी हों, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया। एक नहीं, कितने ऐसे बहादुर योद्धा हुए, जो आजादी की खातिर या राष्ट्र की सुरक्षा में शहीद हो गए। आज दुनिया में उनका नाम है।
भगवान राम को कौन नहीं जानता। अच्छा-भला राज्य मिल रहा था, किंतु पिता के वचनों के अनुसार वन का राज्य स्वीकार किया। जिस भरत को राज्य मिला, उसने भी उस राज्य को नहीं लिया। इससे बड़ी मिसाल क्या होगी, जबकि ज्यादातर यही पढ़ने को मिलता है कि राज्य के लिए भाई ने भाई का खून कर दिया। ऐसे एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं।
जब इंद्र असुरों के अत्याचार से बहुत त्रस्त थे, तब उन्होंने ऋषि दधीचि से उनकी अस्थियों का दान माँगा। जीते-जी देह दान करना कोई आसान काम नहीं होता, लेकिन दधीचि को मालूम था कि वह यह दान करके मानव जाति को असुरों के त्रास से मुक्ति दिला सकते हैं, अतः उन्होंने हँसते-हँसते अपनी देह का त्याग कर दिया। इससे बड़ा दान कोई क्या करेगा ? दुनिया आज तक उनको महादानी के रूप में जानती है और जानती रहेगी। इसी लिए ‘देहदान को दधीचि दान’ का नाम दिया गया है।
राजा हरिश्चंद्र ने स्वप्न में देखा, कि उन्होंने विश्वामित्र को अपना सारा राज्य दान में दे दिया है। वह स्वप्न उन्होंने राजसभा में सुनाया तो विश्वामित्र ने उनसे उनका राज्य माँगा। हरिश्चंद्र ने हँसते-हँसते अपने राज्य का दान कर दिया। सबसे बड़ी बात कि विश्वामित्र ने यह भी कहा कि जितना बड़ा दान, उतनी बड़ी दक्षिणा। दक्षिणा कहाँ से देते ? राजकोष से देने लगे तो विश्वामित्र ने कह दिया कि राज्य मेरा है तो राजकोष भी मेरा है। काशी में जाकर रहे तो दक्षिणा चुकाने के लिए पत्नी और पुत्र को बेचा व स्वयं को भी बेचा और चाण्डाल के यहाँ नौकरी की। उनकी पत्नी, पुत्र एवं स्वयं उन्होंने अनन्त परेशानियाँ भुगतीं।अंत में सत्य की परीक्षा में सफल हुए और आज संसार उन्हें ‘सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र’ के रूप में जानता है।
कहावत प्रसिद्ध है-
चाँद टरै, सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार,
पै राजा हरिश्चंद्र का टरै न सत्य विचार।
उशीनरपति राजा शिवि ने एक कबूतर की बाज से रक्षा करने के लिए अपने शरीर का मांस देना स्वीकार किया, क्योंकि बाज ने कहा था कि मैं निर्जीवों का मांस नहीं खाता। सजीवों का माँस ही खाता हूँ। राजा ने पहले अपना एक हाथ काटा। तुला नीचे नहीं हुई। फिर एक टांग, फिर दूसरी टांग। तराजू फिर भी नीचे नहीं हुई। तब स्वयं ही तराजू में बैठ गए। यह भी देवताओं द्वारा उनकी परीक्षा थी, क्योंकि वह शरणागत को शरण देने के लिए प्रसिद्ध थे। आज राजा शिवि दुनिया में अपनी उदारता के लिए जाने जाते हैं। उन्हें ‘शरणागतवत्सल’ कहा जाता है।
कर्ण के दान के बारे में कौन नहीं जानता। सभी उसे महादानी कर्ण कहते हैं। उनके दान के बारे में कई कहानियाँ प्रसिद्ध हैं। एक कहानी यह है कि एक बार कोई ब्राह्मण अर्जुन के पास गया कि मुझे अपनी पत्नी का संस्कार करना है। उसके लिए मुझे चंदन की लकड़ियाँ चाहिए। चंदन की लकड़ियाँ कहीं भी नहीं मिलीं। तब वह ब्राह्मण कर्ण के पास गया। कर्ण ने भी अपने सेवकों को चंदन के लकड़ी लाने के लिए भेजा, किंतु कहीं चंदन के लकड़ी उपलब्ध नहीं थी। कर्ण के महल में चंदन की लकड़ी के पल्ले लगे हुए थे। उसने वह पल्ले उखड़वा कर उस ब्राह्मण को दिए, ताकि वह अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार चंदन की लकड़ी से कर सके।
कर्ण के शरीर पर जन्म से ही कवच कुंडल थे, जिन्हें इंद्र ने महाभारत युद्ध से पहले दान में माँग लिया।
भगवान कृष्ण का तो कहना ही क्या। भगवान तो वे बहुत बाद में बने, पहले तो साधारण ही थे।उन्होंने अपने जीवन में कभी सुख नहीं देखा, लेकिन औरों को हमेशा सुख देते आए। जन्म जेल में हुआ। बचपन में ही मामा कंस ने उनके वध के लिए पूतना राक्षसी भिजवाई जो कृष्ण के हाथों मारी गई। अत्याचारी मामा कंस ने छल से कृष्ण को मथुरा मरवाने के लिए बुलवाया था, किन्तु खुद ही बालक कृष्ण के हाथों मारा गया। कंस का वध करके अपने नाना का राज्याभिषेक किया। जिन राजाओं ने जनता को प्रताड़ित किया, उन सबका उन्होंने संहार किया। जरासंध की कैद से अनेक राजाओं को मुक्त कराया। वह चाहते तो उन सबके राज्य अपने पास रख सकते थे; लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। सबका राज्याभिषेक स्वयं किया।
नरकासुर ने १६१०० रानियों व राजकुमारियों को कैद किया हुआ था। घनघोर युद्ध करके नरकासुर का वध करके उसकी कैद से कृष्ण ने उन्हें मुक्त कराया। जब वे अपने घर गईं तो उनके पिता और पतियों ने उन्हें स्वीकार करने से मना कर दिया। तब कृष्ण ने उन सबसे विवाह किया, ताकि वे समाज में सम्मान से जी सकें। हालांकि, लोगों ने उन्हें क्या-क्या नहीं कहा। रसिया तक कहा, लेकिन उन्होंने इन सब बातों की कोई परवाह नहीं की। एक नए युग की स्थापना की, कि नारी भोग्या नहीं होती, पूजनीया होती है। उसे भी सम्मान से जीने का हक है। यदि उन स्त्रियों के पिता और पति अपनी बेटी और पत्नी की रक्षा नहीं कर सके तो इसमें उन स्त्रियों का क्या दोष था ?
आज लोग कृष्ण को भगवान कह कर पूजते हैं। वो सारा जीवन औरों के लिए ही जीते रहे।
यह ठीक है, कि नेक काम करने वालों को अंगारों पर चलना पड़ता है, लेकिन कुछ लोगों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि उनके मार्ग में चाहे लाखों चुनौतियाँ आए, वे उन सबको पछाड़ते हुए लक्ष्य की ओर अग्रसर रहते हैं। समाज के हित में क्या अच्छा है, देश के हित में क्या उचित है, उसके लिए हर कष्ट सहने को तैयार रहते हैं। और ऐसे लोगों का ही दुनिया में नाम होता है, जो दूसरों के हित के लिए जीता है, क्योंकि…
‘परहित सरस धर्म नहीं भाई।’