प्रीति तिवारी कश्मीरा ‘वंदना शिवदासी’
सहारनपुर (उप्र)
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हट जाए मंच से पर्दा प्रकट होता है कलाकार,
मन, बुद्धि हटे माया-पर्दा लेते हैं ईश्वर आकार।
संसार सब बंधा प्रभु अदृश्य माया से,
असत वास्तविक लगता है प्रभु की माया से
भ्रम जगत में क्षण-क्षण प्रभु की माया ही करती साकार।
जीव उलझ इन भ्रमों में फंसता जन्म मृत्यु चक्र,
पहुंचाए माया प्रभु-मिलन मार्ग कथन वक्र भय,
आकर्षण,सुख-दु:ख बन माया ले जाए प्रभुजी के ही द्वार।
उद्देश्य जीवन का पहचानो अरे! मनुज,
हटा माया पर्दा प्रभु निकट पहुंचो अरे! मनुज
माया को ही बना लो साधन और उतरो इस भव से पार।
नदी पार हम को कराती है जैसे नाव,
माया के अनुभव मन में भरते प्रभु मिलन चाव
दीप जलाओ विवेक और भक्ति तभी हो सकता उद्धार।
जो दीप हाथ में लेता है भक्ति-विवेक,
मिटे माया-अंध प्रकाशित ब्रह्म निज विवेक
भ्रम से ब्रह्म तक की यात्रा करनी है सब को एक बार।
यही है परम सत्य जीवन का समझो जी,
उलझो ना माया से प्रभु भजो समझो जी
माया खेल रचित है स्वयं प्रभु का कर लो प्यारे ये स्वीकार।
सूर्य के निकलते ही अंधकार मिट जाए,
ब्रह्म प्रकाशित हो तो माया-पर्दा जल जाए
साधना,श्रद्धा-भक्ति प्रभु नाम-जप बनेगा प्रभु मिलन आधार।
हट जाए मंच से पर्दा प्रकट होता है कलाकार,
मन, बुद्धि हटे माया-पर्दा लेते हैं ईश्वर आकार॥