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बिखरे-बिखरे से इशारे

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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बिखरे-बिखरे से इशारे,
तेरी यादों के सहारे
जी रहे हैं अब भी हम, तेरे ही इशारे,
चुपके-चुपके दिल ये पूछे।

कहाँ गए तुम छोड़ करे मुझे बेसहारे,
बिखरे-बिखरे से इशारे
अब भी मेरा दिल देखे तेरी राह,
तूने क्या किए इशारे, अधूरे-अधूरे बिखरे-बिखरे।

कैसे समझूं मैं तेरे इशारे ?, बिखरे-बिखरे,
आती है याद तेरी, अब पुराने इशारे।
आँखों ही आँखों में करके इशारे वह बातें करते,
आज तुम हो नहीं, कैसे समझूं तेरे बिखरे-बिखरे इशारे।

मन को छू जाते रह-रह कर, मेरी यादों में तुम आते,
दूर गए हो बहुत तुम, आ न सको मेरे पास
दूर गगन से चाँद द्वारा अब करते इशारे,
कभी मुस्काते कभी रुलाते, चाँद देख-देखकर मुझे।

मेरा मन पुलकित हो जाता, तेरे इशारे पा के,
समझ-समझ कर तेरे इशारे, हम खुश हो जाते
कभी रुलाते हैं, कभी हँसाते हैं तेरे इशारे,
दिल ने फिर याद किया, बरसने लगी आँखें।

मेरा मन तड़प-तड़प के रह जाए,
हवा के झोंकों में रह-रह कर पुकारे
याद दिलाए तेरी मधुर-मधुर मुस्कान मुझे,
आँखों से आँसू भी झलक ही जाए।

जब तेरी मुस्कान होंठों में आए मेरे,
नील गगन में जब तारे चमके
तुम इशारे करो बिखरे-बिखरे से,
समझ में तो आए नहीं, फिर भी तेरी याद दिलाए।

बादल में बिजली कड़के, लगे तुम इशारे करते,
हट जाओ पानी से, भीग जाओगे
प्यार कभी भी समाप्त नहीं होता, रहे या नहीं रहें,
फिर भी हिदायतें देते रहते बिखरे- बिखरे इशारे।

मन के भावों से अब समझ ही जाते,
तेरे बिखरे-बिखरे इशारे॥