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भीतर का रावण मारें

शीला बड़ोदिया ‘शीलू’
इंदौर (मध्यप्रदेश )
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भीतर का रावण (विजयादशमी विशेष) …

दशहरा हमें केवल रावण के पुतले का दहन करना नहीं सिखाता, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि हमारे भीतर छिपी बुराइयों को पहचानकर उन्हें समाप्त करना ही सच्चे अर्थों में विजयादशमी मनाना है।
   रामायण में रावण के १० सिरों को प्रतीकात्मक रूप से मनुष्य के भीतर मौजूद १० बुराइयों से जोड़कर भी देखा जा सकता है। जब तक मनुष्य अपने भीतर की बुराइयों पर विजय प्राप्त नहीं करता, तब तक उसका वास्तविक विकास अधूरा रहता है।

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अहंकार का रावण-
  स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझना,
अपनी गलती स्वीकार न करना और दूसरों का अपमान करना।
   विनम्रता अपनाएँ, दूसरों की बात सुनें और अपनी गलतियों को स्वीकार करना सीखें।

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क्रोध का रावण-
छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करना, गुस्से में अपशब्द बोलना और अपने क्रोध से दूसरों को दुख पहुँचाना।
  बोलने से पहले कुछ क्षण रुकें, गहरी साँस लें और समस्या का समाधान शांति से खोजें।

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लालच का रावण-
 आवश्यकता से अधिक पाने की इच्छा रखना, दूसरों के अधिकार छीनना एवं धन और वस्तुओं को ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मानना।
   संतोष का भाव विकसित करें, ईमानदारी से काम करें और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करें।

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ईर्ष्या का रावण-
    दूसरों की सफलता से दुखी होना, दूसरों की खुशियों को देखकर जलना तथा किसी को आगे बढ़ते देखकर उसे रोकने का प्रयास करना।
    दूसरों की सफलता से प्रेरणा लें और अपनी क्षमताओं को विकसित करने पर ध्यान दें।

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कामना और अनियंत्रित इच्छाओं का रावण–
   अपनी इच्छाओं को ही सबसे महत्त्वपूर्ण मानना, दूसरों की भावनाओं और सहमति की उपेक्षा कर, अपनी इच्छा पूरी करने के लिए गलत रास्ता अपनाना बहुत गलत है।
   आत्मसंयम के साथ, दूसरों की गरिमा का सम्मान करें और अपनी इच्छाओं को नैतिकता के अनुसार दिशा दें।

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झूठ का रावण-

 अपने स्वार्थ के लिए झूठ बोलना, अपनी गलती छिपाने के लिए दूसरों को दोष देना एवं लोगों के विश्वास को तोड़ना।
          सत्य बोलने का साहस रखें, जिम्मेदारी स्वीकार करें और अपने व्यवहार में पारदर्शिता रखें।
◾घृणा का रावण-
     जाति, धर्म, भाषा, लिंग या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव करना और दूसरों के प्रति नफरत रखना, साथ ही व्यक्ति को उसकी पहचान के कारण कमतर समझना।
   समानता, करुणा और मानवीय गरिमा को महत्व दें एवं प्रत्येक व्यक्ति के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करें।
◾स्वार्थ का रावण-
      केवल अपने लाभ के बारे में सोचना और दूसरों की परेशानियों के प्रति संवेदनहीन रहना एवं अपने फायदे के लिए दूसरों का नुकसान करना।
   दूसरों की सहायता करें, अपनी जिम्मेदारियाँ निभाएँ और सामूहिक हित का भी ध्यान रखें।
◾बदले की भावना का रावण-
    किसी की गलती को जीवनभर याद रख कर, हर अपमान का बदला लेने की इच्छा रखना भी रावण का ही एक सिर है। ऐसे ही
पुराने विवादों को बार-बार बढ़ावा देना।
  क्षमा करना सीखें, लेकिन अपनी सीमाएँ भी निर्धारित करें। अन्याय होने पर बदला लेने के बजाय उचित और शांतिपूर्ण तरीके से न्याय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
◾अन्याय और गलत कार्यों का समर्थन करने वाला रावण-
     गलत होते देखकर भी चुप रहना अभी रावण का एक प्रतिरूप है, अपने प्रिय व्यक्ति की गलती को सही ठहराना एवं कमजोर व्यक्ति के साथ हो रहे अन्याय की अनदेखी करना।
     सत्य और न्याय का साथ दें। अन्याय का विरोध विवेकपूर्ण तरीके से करें और जरूरत पड़ने पर जिम्मेदार व्यक्तियों से सहायता लेना उचित है।
🔹कुछ और रावण, जो हमारे भीतर छिपे हो सकते हैं। इन दस बुराइयों के अलावा भी कुछ ऐसी कमजोरियाँ हैं, जिन पर विजय पाना आवश्यक है- अभिमान, दिखावा, चुगली, संकीर्ण सोच, असहिष्णुता, जिम्मेदारी से भागना, दूसरों को नियंत्रित करने की इच्छा, भेदभाव एवं गलत बात पर चुप्पी।
  याद रखिए, मनुष्य की कमजोरी उसकी पहचान नहीं होती। अपनी गलती को पहचानकर स्वयं में सुधार करना ही उसकी वास्तविक शक्ति है।
🔹अपने भीतर के रावण को कैसे नष्ट करें-
आत्मचिंतन, गलतियों की जिम्मेदारी लेना, दोष दूसरों पर डालने की बजाय उसे स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि सुधार की पहली सीढ़ी है।
   हमारे विचार, हमारे व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसलिए किसी के प्रति नकारात्मक विचार आने पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय उसके कारण को समझने का प्रयास करें।
🔹अच्छे संस्कार और सही संगति-
  ऐसे लोगों के साथ समय बिताएँ, जो ईमानदारी, संवेदनशीलता, परिश्रम और अच्छे व्यवहार को महत्व देते हैं।
🔹प्रतिदिन एक बुराई पर विजय-

 एक ही दिन में सभी कमजोरियों को समाप्त करने का दबाव मानव जीवन में संभव नहीं है। प्रतिदिन अपने व्यवहार में एक छोटा-सा सुधार का संकल्प ही अपने भीतर के रावण का वध करना है।

परिचय-शीला बड़ोदिया का साहित्यिक उपनाम ‘शीलू’ और निवास इंदौर (मप्र) में है। संसार में १ सितम्बर को आई शीला बड़ोदिया का जन्म स्थान इंदौर ही है। वर्तमान में स्थाई रूप से खंडवा रोड पर ही बसी हुई शीलू को हिन्दी, अंग्रेजी व संस्कृत भाषा का  ज्ञान है, जबकि बी.एस-सी., एम.ए., डी.एड. और बी.एड. शिक्षित हैं।  शिक्षक के रूप में कार्यरत होकर आप सामाजिक गतिविधि में बालिका  शिक्षा, नशा मुक्ति, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, बेटी को समझाओ अभियान, पेड़ बचाओ अभियान एवं रोजगार उन्मुख कार्यक्रम में सक्रिय हैं। इनकी लेखन विधा-कविता, कहानी, लघुकथा, लेख, संस्मरण, गीत और जीवनी है। प्रकाशन के रूप में काव्य संग्रह (मेरी इक्यावन  कविता) तथा १५ साझा संकलन में रचनाएँ हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी को स्थान मिला है। इनको मिले सम्मान व पुरस्कार में गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड सम्मान (साझा संकलन), विश्व संवाद केंद्र मालवा (मध्य प्रदेश) द्वारा सम्मान, कला स्तम्भ मध्य प्रदेश द्वारा सम्मान, भारत श्रीलंका सम्मिलित साहित्य सम्मान और अखिल भारतीय हिन्दी सेवा समिति द्वारा प्रदत्त सम्मान आदि हैं। शीलू की विशेष उपलब्धि गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में रचना का शामिल होना है। आपकी लेखनी का उद्देश्य साहित्य में उत्कृष्ट लेखन का प्रयास है। मुन्शी प्रेमचंद, निराला, तुलसीदास, सूरदास, अमृता प्रीतम इनके पसंदीदा हिन्दी लेखक हैं तो प्रेरणापुंज गुरु हैं। इनका जीवन लक्ष्य-हिन्दी साहित्य में कार्य व समाजसेवा है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“हिन्दी हमारी रग-रग में बसी है।”