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मैं अंत में…

बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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एक समय के बाद
धीरे-धीरे कम होने लगती है
मनुष्य के भीतर की आवाज़, 
वह बोलता तो है
पर उसके शब्दों में,
पहले जैसी गर्माहट नहीं बचती। 

जैसे किसी पुराने चूल्हे में,
राख तो हो
पर आग न बची हो कहीं, 
लोग समझते हैं
चुप रहना स्वभाव है उसका। 

कोई नहीं देख पाता,
कि वह भीतर ही भीतर
कितनी आवाज़ों के ढहने से बना है, 
कुछ सपने
बहुत देर तक जीवित रहते हैं,
यह जानते हुए भी
कि उनका पूरा होना संभव नहीं
वे मनुष्य के भीतर
धीरे-धीरे एक सूखे कुएँ की तरह, भरते रहते हैं
अँधेरे से। 

और फिर एक दिन,
उम्मीद
प्रार्थना की तरह नहीं
आदत की तरह बचती है, 
हम सुबह उठते हैं
चेहरे पर पानी डालते हैं,
लोगों से मिलते हैं
हँसते हैं,
काम करते हैं
लेकिन भीतर,
एक पूरा संसार
बिना शोर किए उजड़ता रहता है। 

मैंने देखा है,
सबसे अधिक अकेले वे लोग होते हैं
जो सबसे अधिक दूसरों को समझते हैं, 
वे अपने हिस्से का दुःख
किसी को नहीं देते,
बस धीरे-धीरे
अपने भीतर जमा करते रहते हैं। 

कभी किसी शाम,
जब सूरज उतर रहा होता है
और आकाश का रंग
पुराने ज़ख़्म जैसा दिखाई देता है, 
तब लगता है
जीवन कोई उपलब्धि नहीं-
एक लंबी थकान है,
जिसे मनुष्य
सम्मान के साथ ढोता रहता है। 

सम्बंध,
एक समय के बाद
पेड़ों से टूटते पत्तों जैसे हो जाते हैं,
आवाज़ नहीं करते
पर गिरते लगातार रहते हैं, 
और तब
मनुष्य को सबसे अधिक डर
अकेले कमरे से नहीं,
अपने भीतर बची हुई स्मृतियों से लगता है। 

क्योंकि स्मृतियाँ,
कभी मरती नहीं
वे सिर्फ़
रात गहराने का इंतज़ार करती हैं, 
यक़ीन है
जब मैं अपने अंतिम दिनों में,
किसी खिड़की के पास बैठी होऊँगी
तो मुझे दुनिया की क्रूरताएँ याद नहीं आएँगी,
बस वे लोग याद आएँगे
जिन्होंने कभी
मेरे मौन को समझने की कोशिश की थी। 

मैं अंत में,
किसी टूटी हुई स्त्री की तरह नहीं
बल्कि उस पुराने वृक्ष की तरह जाना चाहती हूँ-
जिसने आँधियाँ देखीं
सूखे सहे, 
फिर भी
अपनी अंतिम साँस तक,
छाँव देना नहीं छोड़ा। 

मेरी आँखों में तब भी,
कुछ अनकहे वाक्य बचेंगे।
और होंठों पर
जीवन को क्षमा कर देने वाली,
एक धीमी मुस्कान॥