कुल पृष्ठ दर्शन : 1

रह जाती है कल्पना

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
****************************************

मौन समर्पण होता है,
वह पुरुष ही होता है
बचपन से देखी गई कल्पना,
कल्पनाओं में एक कल्पना
बन कर रह जाती है कल्पना।

बहनों की इच्छाओं के आगे,
फीकी पर कोई उसकी इच्छाएं
पिताजी का कहना था- लड़का हो,
बड़े होकर कमा कर
पूरी कर सकते हो इच्छाएं।

पुरुषों का हर अरमान दबे का दबा ही रह गया,
चाहत थी सलमान जैसी शर्ट पहनूं!
श्रीमती जी के हर पर्व के आगे अब
तो फीकी पड़ गई चाहतें।

जेब हो खाली, पर ‘सब हो जाएगा’ यह कहना,
रातों को करवटें बदल तकिया भिगोना
हर दिन उजाला है, हर रात है काली,
माँ की भावनाओं को मन में ही दबाना।

ख्वाइश थी बनती कोई दोस्त भी मेरी,
लड़की न सही होती कोई महिला ही अच्छी
बीबी के आगे सब अरमान,
चूर-चूर चकनाचूर हो गए
सपना भी देखता हूँ तो,
मेरी नागिन ही दिखाई देती।

सोचता हूँ नींद के ख्यालों में, कोई परी मिलने ही आती
खुशी के आँसू संग पुरूष,
बिताते हैं सारी जिंदगी।

हर पुरुष की बस यही चाहतें,
कल्पनाओं में भी कभी 
सुख की ज़िन्दगी दिखाती 
ऐ ज़िंदगी
हम सोचते ही रह गए,
कभी नींद में ही मिलने आती
कोई सुन्दर परी।

पुरुषों के दर्द को,
कहाँ समझा कोई करीब से
हर दर्द छुपा के हमदर्द,

बन जाता है पुरुष सदा।
नींद में भी कोई रंगीन ख्वाब,
देखने से डर जाता है पुरुष सदा॥