डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन (हिमाचल प्रदेश)
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सतरंगी दुनिया -२५
आज प्रधानमंत्री द्वारा देश की जनता से जो निवेदन किया गया, उसका असर अब दिखने लगा है। आज सुबह-सुबह कामवाली बाई का फोन आया- बर्तन, कपड़े मेरे घर घर भेज दो। मोदी जी ने वर्क फ्राम होम का आर्डर दिया है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, छोटे अक्षर दिखाई नहीं देते। शायद यह एक इशारा ही है, कि बढ़ती उम्र के साथ छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करें। इस दुनिया में खुश वही लोग हैं, जो स्वयं का मूल्यांकन करते हैं, और दुखी वो हैं, जो दूसरों का मूल्यांकन करते हैं। अजीब बात है कि एक पत्थर एक बार मंदिर जाने पर भगवान बन जाता है, परन्तु इंसान हजार बार मंदिर जाता है पर इंसान नहीं बन पाता है। अपने रिश्तों की बगिया में एक रिश्ता नीम के पौधे जैसा भी रखिए, जो सीख भले ही कड़वी देता है, पर तकलीफ में मरहम का काम करता है।
आधुनिक युग मिलावट का युग है। सबकी हाँ में हाँ मिला दिया करो, रिश्तों की उमर बढ़ जाएगी। जिस पल को आपने अच्छे से जी लिया, वही ज़िंदगी है, बाकी सब तो कैलेण्डर की तारीखें है। पारिवारिक टेंशन एक ऐसी बीमारी है, जो इंसान को अंदर से खा जाती है। इसलिए टेंशन मत पालें। यदि आप खुश हैं तो ये बात दुनिया को न बताएं, क्योंकि लोग अक्सर खिले हुए फूलों को पहले तोड़ते हैं। इसलिए अपनी खुशी छिपाकर रखिए। याद रखिए पैसा सिर्फ आपकी लाइफ-स्टाईल बदल सकता है, दिमाग, नीयत और किस्मत नहीं।
मैंने मौत को देखा तो नहीं, पर शायद वह बहुत खूबसूरत होगी, कमबख्त जो भी उससे मिलता है, जीना छोड़ देता है। बड़ों का दिया आशीर्वाद और अपनों की दी हुई शुभकामनाओं का कोई रंग नहीं होता, लेकिन जब ये रंग लाते हैं तो जीवन में रंग भर जाते हैं। आज बैंक में एक पेंशनर ने पूछा-अधिक मास की पेंशन इस मास की पेंशन के साथ मिलेगी या अलग से ?
तकलीफ होने पर जो व्यक्ति सबसे पहिले याद आए, वो ज़िंदगी का सबसे कीमती इंसान होता है। बैंक खाते की तरह यदि दिल को आधार कार्ड से जोड़ दिया जाए तो पता चल जाएगा कि दिल के कितने खाते हैं।
मुस्कान और सम्मान दुनिया का सबसे बड़ा धन है। इन्हें कमाना सीखिए, ज़िंदगी खूबसूरत बन जाएगी। अच्छी राय और अच्छी चाय सब जगह नहीं मिलती है। चाय पीकर खुश रहा करो, ज़िंदगी का क्या है; ये तो वैसे भी उबल रही है। रिश्तों की कदर कीजिए। रिश्तों की पाठशाला वहीं चलती है, जहाँ राजनीति और गणित के विषय नहीं होते। संभल कर रहिए जमाने से- क्योंकि आजकल के लोगों को आप नहीं चाहिए, बल्कि आपसे मिलने वाला फायदा चाहिए। दर्द और दौलत में फर्क देखिए-दर्द पाकर लोग अपनों को याद करते हैं और दौलत पाकर अपनों को भूल जाते हैं।
टेंशन, डिप्रेशन और बैचेनी इंसान को तभी होती है, जब वह खुद के बारे में कम और दूसरों के बारे में ज्यादा सोचता है। इसलिए स्वयं पर पहिले ध्यान दीजिए। चालाकी वो अभागी सड़क है, जो हर बारिश के बाद उखड़ जाती है। भगवान ने इंसान बनाया था प्यार करने के लिए और पैसा बनाया था इस्तेमाल करने के लिए, पर इस कलियुग में उल्टा हो रहा है। लोग पैसे से प्यार करते हैं और इंसान का इस्तेमाल करते हैं।
बीवीयाँ भी अजीब होती हैं। शौहर से झगड़ा हो गया। बीवी से तंग आकर शौहर खुदकुशी करने जाने लगा, तो बीवी ने कहा-जाने से पहिले २-४ सफेद सूट दिलवाकर जाओ, अन्यथा मैं क्या पहनूंगी। शौहर कब खुश होता है, जब बीवी नयी हो या बीबी नहीं हो।
लड़कियाँ खाना कम खाती हैं,
शायद भाव इसलिए ज्यादा खाती हैं।
परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी (हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस., एम.ए., एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका, व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है। आपको राजस्थान से ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष (सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके |