कुल पृष्ठ दर्शन : 4

साहित्य-साधना का कर्मस्थल है शशिकमल पुस्तकालय

पटना (बिहार)।

वरिष्ठ साहित्यकार शशि भूषण सिंह एक समर्पित साहित्य-साधक हैं। उनके संयोजन और संरक्षण में शशिकमल पुस्तकालय निरंतर फल-फूल रहा है। उन्होंने प्रत्येक महीने काव्य-गोष्ठी आयोजित करने तथा प्रतिवर्ष एक बड़े साहित्यिक आयोजन के साथ साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित करने की नई पहल की है। यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है।
      दानापुर के नासरीगंज स्थित शशिकमल पुस्तकालय में २८वीं मासिक कवि-संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने यह उद्‌गार व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और माँ सरस्वती की वंदना से हुआ। संगोष्ठी में ग़ज़ल, मुक्त छंद कविता, गीत, लोकगीत आदि की उत्कृष्ट प्रस्तुतियाँ दी गई।
गोष्ठियों की प्रासंगिकता पर कवि सिद्धेश्वर ने कहा कि ऐसी सतत सृजनशीलता और साहित्य के प्रति सच्चा समर्पण आज के समय में बहुत कम देखने को मिलता है। साहित्यिक परिवेश की विसंगतियों के बीच कुछ ऐसे साहित्यकार भी हैं, जो साहित्य को साधना और साहित्यिक सेवा को अपना सामाजिक धर्म मानते हैं। यहाँ का साहित्यिक परिवेश देखकर मुझे ऐसा लग रहा है कि शशिकमल पुस्तकालय साहित्य साधना का सच्चा कर्मस्थल है।
   गोष्ठी में लगभग २४ कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। इनमें श्री द्विवेदी, शशि भूषण सिंह, सुनील कुमार मलंग, सिद्धेश्वर और राजदेव सिंह प्रमुख रहे।
      संयोजक शशि भूषण सिंह के धन्यवाद ज्ञापन के साथ इसका समापन हुआ।