नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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आज स्वास्थ्य पर सभी का अधिकार है, पर सबको अपार सुविधा नहीं मिलती है, जबकि यह मौलिक अधिकार है एवं सभी को सदाबहार सुविधा मिलनी चाहिए। आज किसी गरीब को यदि बीमारी हो जाए, तो जीवन उसका नरक बन जाता है। पैसे की चिंता जीते-जी उसके प्राण हरती है। बड़े-बड़े लोग क्लिनिक खोलकर बैठे हैं, भारी फीस के साथ, तो फिर जन-साधारण कैसे जाए उस क्लिनिक में दिखाने ? विवश होकर जाना पड़ता है उसे सरकारी अस्पताल में, पर पैसों का स्वार्थ वहाँ भी आड़े आता है।
भारत सरकार और राज्य सरकारें आम जनता के लिए सस्ती और निःशुल्क सेवाएँ चला रही हैं। इसमें ‘आयुष्मान भारत’ के तहत ५ लाख तक का मुफ्त इलाज कर रहे हैं। जेनेरिक दवाएँ कम दाम पर उपलब्ध कराई जाती हैं। राज्य सरकारें भी अपने सभी निवासियों को मुफ्त इलाज का लाभ दे रही हैं। स्वस्थ जीवन पर सबका अधिकार होता है। सभी के लिए बिना भेदभाव किए स्वास्थ्य सेवाएँ आसान और किफायती मिलनी ही चाहिए। उनके सम्मान और मानवीय गरिमा का भी ध्यान रखकर काम करना चाहिए।
मरीजों की हमेशा उच्च स्तर की सेवा होनी चाहिए, जिससे किसी की मौत न होने पाए। उचित देखभाल और सम्मानजनक व्यवहार सबके साथ होना चाहिए। बीमारियों का इलाज गरीबों की पहुँच में होना चाहिए, ऐसा जो सस्ता और आसान हो।
सवाल यह है कि आज इलाज बीमार क्यों है ? इसका कारण है कि स्वार्थ ज्यादा बढ़ गया है। हर आदमी पैसे के लिए अपना ईमान बेचते रहता है। सरकारी काम में भी सभी परेशान करते रहते हैं। स्वार्थ टकराता है और काम नहीं बन पाता है। हर आदमी पैसा कमाने के लिए अपने स्वार्थीपन पर जीता है। डॉक्टर हों या दवा दुकान वाले, सभी अपने-अपने हित के लिए ही सतर्क रहते हैं। मानवता का अंश कहीं नहीं देखने को मिलता है।
गरीब एवं मरीज की मजबूरी समझकर और भी पैसे की मांग करते हैं, जिससे आमजन को परेशानी होती है। पास में दवा रहते हुए भी नहीं देते हैं और ऊँचे दाम पर देते हैं। सवाल वही है कि जब स्वास्थ्य पर सबका अधिकार है, तो इलाज पर भी सबका समान अधिकार क्यों नहीं है, जो सस्ता और आसान हो। यह नहीं होने से ही इलाज भी बीमार पड़ा हुआ है। इसलिए सभी को इसका ही इलाज करना चाहिए। सभी में दया, ममता का विकास हो, तभी मानवीय रूप में बीमार को लाभ मिलने की सफलता मिलेगी।