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हमेशा सच के साथ चलिए

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन (हिमाचल प्रदेश)
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सतरंगी दुनिया-२२…

ज़िंदगी को ठंड और घमंड दोनों से बचाकर रखना चाहिए, क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में आदमी अकड़ जाता है। हम लोग घर के दरवाजे पर शुभ-लाभ लिखते हैं। केवल शुभ-लाभ लिखने से कुछ नहीं होगा। शुभ विचार रखिए अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी, फिर लाभ ही लाभ होगा। भगवान ने हर इंसान को किसी वजह से बनाया है, इसलिए खुद को स्पेशल समझना शुरू कर दो। वाणी और विचार ये दोनों उत्पाद हमारी खुद की कम्पनी के हैं। इनकी क्वालिटी जितनी अच्छी रखेंगे, कीमत उतनी ही ज्यादा मिलेगी।
    भिखारी भी कभी-कभी विशेष जवाब देकर सोचने को मजबूर कर देते हैं। एक व्यक्ति प्रतिदिन भिखारी को १० रुपए देता था। अचानक पिछले कुछ दिनों से उसने भिखारी को १ रूपया प्रतिदिन देना शुरू कर दिया। भिखारी ने कारण पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया कि अब उसकी शादी हो गयी है। तब भिखारी ने कहा-आपको शर्म नहीं आती, मेरे पैसों से बीवी-बच्चों को पाल रहे हो।    आजकल, जमाना अजीब हो गया है। अगर आप अपनी तारीफ सुनना चाहते हैं, तो आपको अपनी शोक सभा का इंतजार करना पड़ेगा।
    कल एक नौजवान वैलेन्टाईन-डे स्पेशल १२ कार्ड खरीद रहा था। मैंने उत्सुकतावश पूछा-इतने कार्ड का तुम क्या करोगे ? यह सुनकर उसके चेहरे पर उत्तरी ध्रुव से लेकर दक्षिणी ध्रुव तक की लम्बी मुस्कान खिल गई। उसने कहा-अंकल केवल १२ कार्ड ही खरीदे हैं। मैं अपनी हर गर्लफ्रेंड को विश करना चाहता हूँ।   
        इंसान भी अजीब है। पहले, दौलत कमाने के चक्कर में सेहत खोता है। और बाद में सेहत पाने के लिए दौलत खोता है। जीता ऐसे है, कि जैसे कभी मरेगा नहीं और मरता ऐसे है कि जैसे कभी जिया ही नहीं।    विचार हमारे अपने होते हैं, उन पर किसी का कॉपीराइट नहीं होता है। अजीब है मनुष्य-लम्बी उम्र तो चाहता है परन्तु बूढ़ा नहीं होना चाहता, स्वर्ग सभी चाहते हैं, परन्तु कोई मरना नहीं चाहता है।
     माँ के आचल में सोने का सुख अगली पीढ़ी नहीं ले पाएगी, क्योंकि जीन्स पहनने वाली माँ आँचल कहाँ से लाएगी ?
  आजकल हम लोग वेस्टर्न कल्चर अपना रहे हैं, तो कोई दिक्कत नहीं लेकिन यह जरूर याद रखें सूरज जब भी वेस्ट (पश्चिम) में गया है, तब हमेशा डूबा ही है। हर कलाकार अपनी कलाकृति पर अपना नाम देता है, हर कथाकार अपनी कहानी पर अपना नाम देता है, पर इस दुनिया में एक माँ है जो संतान को स्वयं जन्म देकर भी नाम पिता का देती है। हमेशा सच के साथ चलिए, क्योंकि इस रास्ते में आपको कभी भीड़ नहीं मिलेगी।
    इस दुनिया का दस्तूर अजीब है। दौलत चाहे कितनी भी बेईमानी से घर आए, उसकी पहरेदारी के लिए सबको ईमानदार व्यक्ति चाहिए। 
 भारत में नि:शुल्क ज्ञान बाँटने वाली टाप 4 यूनिवर्सिटियाँ- पान का ठेला, नाई की दुकान, दारू पीया आदमी, व्हाट्सप्प। भारत में मंदिर एक ऐसी जगह है, जहां गरीब बाहर भीख मांगते हैं और अमीर अंदर। रोटियों की भी अजीब किस्मत है-अमीर आदमी आधी खाकर छोड़ देता है और गरीब आधी में पूरी ज़िंदगी गुजार देता है। अमीर रोटी पचाने के लिए घूमता है और गरीब रोटी कमाने के लिए घूमता है।
      *भारत में देशभक्ति केवल १५ अगस्त और २६ जनवरी को ही दिखती है। उसके बाद तिरंगे से लिपटकर अलमारी में सोती है। आज से आप स्वयं को स्पेशल समझना शुरू कर दो, क्योंकि भगवान ने किसी को बेवजह नहीं बनाया है।
मत करो किसी का इंतजार, आना होगा तो आएगा, 
जो होगा हमारे नसीब में, हमें जरूर मिल जाएगा।

परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी (हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस., एम.ए., एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका, व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है। आपको राजस्थान से ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष (सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके |