इंदौर (मप्र)।
अंग्रेजों ने भारत पर अपनी सत्ता कायम करने के लिए भारतीय संस्कृति और भाषा के बदले अंग्रेजी को हम पर थोप दिया था और राजकाज की भाषा अंग्रेजी को बना दिया, लेकिन आजादी के बाद धीरे-धीरे हिंदी राजभाषा का उत्थान होने लगा और एक बार फिर से भारत के माथे की बिंदी, हिन्दी बन गई है। आकाशवाणी, दूरदर्शन और मीडिया ने भी हिंदी के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लेखक, साहित्यकार और कवियों ने इस माध्यम से हिंदी को जन-जन की भाषा बनाया। हिंदी देवनागरी जो बोली जाती है, वही लिखी जाती है;यही इस भाषा का सौंदर्य है।
दूरदर्शन केंद्र इंदौर में हिंदी पखवाड़े के शुभारंभ अवसर पर संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि साहित्यकार, विचारक शोधकर्ता एवं अटल बिहारी शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय इंदौर की प्राचार्य डॉ. ममता चंद्रशेखर ने यह बात कही। इस अवसर पर कार्यक्रम प्रमुख राहुल पवार ने कहा कि मनुष्य दूसरे जीवों से ज्यादा विकसित इसीलिए हो पाया, क्योंकि हमारे पास आपसी संवाद करने का माध्यम भाषा के रूप में था, भाषा से हम अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। ये कह सकते हैं कि हिन्दी ने हमें आपस में जोड़ रखा है।
तकनीकी प्रमुख अभय गुप्ता ने केन्द्र पर हो रहे राजभाषा सबंधी कार्यो की सराहना की, वहीं अनुरोध किया कि केन्द्र पर पूरी तरह सभी कार्य हिन्दी में किया जाए।
इससे पहले मॉं सरस्वती की तस्वीर पर माल्यार्पण से कार्यक्रम की शुरूआत हुई। केन्द्र पर राजभाषा संबंधी गतिविधियों की जानकारी अंजू बडगोता ने दी। दूरदर्शन के राजभाषा व श्रोता अनुसंधान अधिकारी प्रवीण नागदिवे ने अतिथियों का परिचय दिया।
संचालन शशिकांत व्यास ने किया। आभार प्रर्दशन सुनील जौहरी ने किया।