अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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नेपाल बाढ़ विशेष…
पहाड़ों ने आज एक भाषा बोली है,
बर्फ पिघली तो धरती भी डोली है।
‘त्रिशूली’ के पानी ने जब रुख मोड़ा है,
भारत की सरहद तक भी नाता जोड़ा है।
लाशें बहकर आईं दूर देश से,
दर्द का रिश्ता बंधा है परिवेश से।
सीमाएं होती हैं नक्शों की लकीरें,
पर नहीं मानते हैं आँसू ये जंजीरें।
उत्तराखंड में भी वही ‘हिमखंड’ हैं खड़े,
हिमाचल के पहाड़ भी बर्फ से जड़े।
फिर सिक्किम की वादी में भी वही डर पला है,
क्या हम तैयार हैं, ये सवाल फिर खुला है ?
‘नेपाल’ ने आईना हमें दिखाया है,
समय रहते चेतने का संदेशा लाया है।
है संदेशा-कहीं पुल जो बनें, तो मजबूत बनें,
अगर बांध जो बनें, ज्ञान-विज्ञान से बनें।
चेतावनी का तंत्र बेहद चुस्त करना जरूरी है,
कि आपदा से पहले हर मुस्तैदी जरूरी है।
सैटेलाइट की आँखें रहें सदा प्रखर,
पहाड़ की साँसों पर हो पक्की नज़र।
‘मानवतावादी’ भारत ने दिया मदद का हाथ तुरंत,
दल भेजे, दिखाया आत्मीय साथ अनंत।
पर केवल मदद काफी नहीं होगी अब,
खुद को बचाना है सबसे बड़ा सबब।
हिमालय अब शांत नहीं, गुस्सा फूटा है,
इसकी खामोशी पर अब विश्वास टूटा है।
जो सोए रहे तैयारी में सुस्त, उन्हें जागना होगा,
कल फिर भारत ना भोगे पीड़ा, सोचना होगा।
आओ हम लें इस पीड़ा से फिर नसीहत,
बचाएं सबका जीवन, रोकें हर मुसीबत।
समझो कि जो पहाड़ हमें छाया, प्रेम, जल देते हैं,
उनकी रक्षा में ही हम भी सुरक्षित रहते हैं॥