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अगला जन्म

दिनेश चन्द्र प्रसाद ‘दीनेश’
कलकत्ता (पश्चिम बंगाल)
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एक दिन सुबह मैं एक मंदिर के निकट से गुजर रहा था, तभी एक कार आकर रुकी। कार के अंदर से एक मैम साहब गोद में एक कुत्ते को लेकर निकली, फिर कुत्ते को प्यार किया और उसे कार की छत पर रखकर मंदिर के अंदर चली गई। अंदर से जब निकली तो पास बैठे भिखारी ने ‘मैम साहब’ कहते हुए हाथ फैला दिया। मैम साहब मुँह बिचकाते और उसे अलग हटते हुए एक सिक्का फेंककर कार के पास चली गई। फिर कुत्ते को गोद में लिया, प्यार किया और कार में बैठकर चली गई।

इतने में देखा कि भिखारी भगवान की मूर्ति के सामने जाकर कुछ कह रहा है। मैं ध्यान से उसकी बात सुनने लगा और उस वक्त जो कुछ भी मैंने सुना वह उसी के शब्दों में-
“भगवान मैंने सुना है कि, कई जन्मों के पुण्य का फल है यह मनुष्य जन्म। बहुत कष्ट के बाद यह मानव शरीर मिलता है, लेकिन मैं आपसे मानव शरीर नहीं मांग रहा हूँ। मुझे फिर से भिखारी नहीं बनना है। मैं आपसे एक छोटी-सी चीज की मांग कर रहा हूँ। कृपा करके मुझे अगले जन्म में ऊँची जाति का कुत्ता बना दें, ताकि मैं भी मलाई और पनीर खा सकूं। गोरी-गोरी मैमों की गोद में बैठकर शहर घूम सकूं। उनके होंठों और गालों को चूम सकूं। उनके मुलायम और मखमली हाथों से सुगंध वाले साबुन से रोज नहा सकूं। क्या मेरी इतनी-सी विनती स्वीकार कर सकते हो प्रभु ?”
“शायद आप मेरी विनती नहीं सुन सकते हैं। मनुष्य से अनगिनत बार ‘बाबूजी कुछ पैसा देना, दाता कुछ रहम करना’ कहते रहने पर भी कोई एक मिलता है जो ५-१० पैसे देता है। वह भी इस तरह फेंकता है, जैसे कोई कचरा फेंक रहा हो। फिर मैं तो आपसे पहली बार ही विनती करने आया हूँ।”
“आप तो उन बड़े-बड़े सेठों, साहूकारों, व्यापारियों की बात सुनेंगे, जो लाखों-करोड़ों लोगों के बच्चों के मुँह का निवाला छीनकर कालाधन बनाए बैठे हैं और आपको भी काला करने से बाज नहीं आते हैं। आप उन चोरों, डकैतों, आतंकवादियों की सुनेंगे जो कहीं आपकी प्रतिमा को नुकसान न पहुंचा दे। या फिर मंदिर का घंटा ही ना खोल ले जाएं ! शायद इन लोगों पर आपकी कृपा कुछ ज्यादा ही होती है।”
“अगर आप ऐसा नहीं कर सकते हैं तो, कम से कम केवल आश्वासन ही दे दीजिए, भले काम हो या ना हो, क्योंकि अधिकांश भारतवासी केवल आशा पर ही जीते हैं। १९४७ से एक आशा के सहारे ही तो आज हम इक्कीसवीं सदी में पहुंच गए हैं। मेरे पास चढ़ावे के रूप में देने के लिए कुछ भी नहीं है दाता।”

इससे आगे सुनने की मुझमें हिम्मत नहीं हुई। मैं तेज-तेज कदमों से वहां से आगे बढ़ गया।

परिचय– दिनेश चन्द्र प्रसाद का साहित्यिक उपनाम ‘दीनेश’ है। सिवान (बिहार) में ५ नवम्बर १९५९ को जन्मे एवं वर्तमान स्थाई बसेरा कलकत्ता में ही है। आपको हिंदी सहित अंग्रेजी, बंगला, नेपाली और भोजपुरी भाषा का भी ज्ञान है। पश्चिम बंगाल के जिला २४ परगाना (उत्तर) के श्री प्रसाद की शिक्षा स्नातक व विद्यावाचस्पति है। सेवानिवृत्ति के बाद से आप सामाजिक कार्यों में भाग लेते रहते हैं। इनकी लेखन विधा कविता, कहानी, गीत, लघुकथा एवं आलेख इत्यादि है। ‘अगर इजाजत हो’ (काव्य संकलन) सहित २०० से ज्यादा रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आपको कई सम्मान-पत्र व पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। श्री प्रसाद की लेखनी का उद्देश्य-समाज में फैले अंधविश्वास और कुरीतियों के प्रति लोगों को जागरूक करना, बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा देना, स्वस्थ और सुंदर समाज का निर्माण करना एवं सबके अंदर देश भक्ति की भावना होने के साथ ही धर्म-जाति-ऊंच-नीच के बवंडर से निकलकर इंसानियत में विश्वास की प्रेरणा देना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-पुराने सभी लेखक हैं तो प्रेरणापुंज-माँ है। आपका जीवन लक्ष्य-कुछ अच्छा करना है, जिसे लोग हमेशा याद रखें। ‘दीनेश’ के देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-हम सभी को अपने देश से प्यार करना चाहिए। देश है तभी हम हैं। देश रहेगा तभी जाति-धर्म के लिए लड़ सकते हैं। जब देश ही नहीं रहेगा तो कौन-सा धर्म ? देश प्रेम ही धर्म होना चाहिए और जाति इंसानियत।