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अपनी चुप्पी तोड़ें…

डॉ. स्वयंभू शलभ
रक्सौल (बिहार)

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१७ साल की एक लड़की एक विधायक के घर नौकरी के लिए बात करने जाती है और फिर कुछ समय बाद वह बताती है कि विधायक के घर पर उसका शील भंग किया गया…। इसके बाद वह गायब हो जाती है…उसके पिता की पुलिस हिरासत में मौत हो जाती है…। फिर एक हादसे में उसकी चाची,मौसी और ड्राइवर की मौत हो जाती है…। उसके वकील गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं…। वह चीफ जस्टिस समेत सभी आला पुलिस अधिकारियों को चिठ्ठी लिखती है,लेकिन उसकी चिट्ठी कहीं नहीं पहुंचती… और आखिरकार इस लड़ाई को लड़ते-लड़ते वह अपनी जिंदगी से हारने लगती है…।
यह कहानी किसी रहस्यमयी रोमांचक या अपराध फ़िल्म की पटकथा नहीं,बल्कि साल २०१७ से शुरू हुए उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता की असल ज़िंदगी की कहानी है…।
आज से लगभग २ साल पहले सुर्खियों में आया यह मामला आजकल फिर से ख़बरों में है…। शोषण,उत्पीड़न और क्रूर अपराध की इस दिल दहला देने वाली घटना ने एक बार फिर से कुछ पुरानी घटनाओं को भी ताजा कर दिया है..। एक बार फिर सभी सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि देश में बहुत कुछ बदला,लेकिन लड़कियों के लिए असुरक्षा का वातावरण नहीं बदला…। २०१२ की निर्भया सामूहिक दुष्कर्म की दिल दहला देने वाली घटना को भी हम अब तक भूल नहीं पाए। दिल्ली की उस वारदात ने पूरे देश को झकझोर दिया था। देश के हर हिस्से में इस घटना को लेकर गुस्सा देखने को मिला। लोग सड़क पर उतरे। अपने-अपने तरीके से अपना दुःख और आक्रोश व्यक्त किया और उस लड़की की सलामती की दुआएं मांगी। थोड़े दिनों के लिए उस लड़की का दर्द मानो हरेक देशवासी का दर्द बन गया। लगा कि इस देश में अब लड़कियों के लिए असुरक्षा का वातावरण खत्म हो जाएगा,लेकिन कुछ नहीं बदला।
ऐसी कितनी ही घटनाएं हर रोज देश के विभिन्न हिस्सों में घटित होती हैं,जो इस कदर चर्चा में नहीं आतीं,जिनकी खबर नहीं बनती लेकिन यह आँकड़े भयभीत करते हैं।
छेड़छाड़,जबरदस्ती,घरेलू हिंसा और बलात्कार के अधिकांश मामले लोक-लाज और समाज के भय के कारण दबा दिए जाते हैं। हमारा सामाजिक परिवेश और कानून व्यवस्था के प्रति अविश्वास ऐसी घटनाओं को चुपचाप सहन करने के लिए मजबूर कर देता है। पिछले साल आसिफा को लेकर भी वही शोर-शराबा हुआ। इस बार यह जघन्य घटना एक मासूम बच्ची के साथ हुई जिसे जाति, बिरादरी और धर्म में फर्क तक नहीं पता था। टीवी के हर समाचार चैनल पर लोग बहस में उलझे रहे। कुछ लोग गुनाहगारों को बचाने के लिए शोर करते रहे तो कुछ लोग उस मासूम के लिए इंसाफ की गुहार लगाते रहे,लेकिन यह सब भी कुछ दिनों की सुर्खियां थीं। थोड़े ही दिनों में दूसरी सनसनीखेज खबर आई और ये तमाम लोग किसी नई बहस में उलझ गए।
ऐसी मौत किसी एक बेबस इंसान की मौत नहीं,बल्कि व्यवस्था पर देश के भरोसे और विश्वास की मौत होती है। सभ्य समाज में जीने का दावा करने वाले हरेक इंसान की मौत होती है।
मानवता को तार-तार करने वाली ऐसी घटनाएं सरकार और पुलिस प्रशासन के साथ समाज को भी कठघरे में खड़ा करती हैं।
जब तक देश के किसी भी कोने में किसी भी बेटी के सामने भय का यह साया बना रहेगा,तब तक हम एक सभ्य समाज में जीने का दावा नहीं कर सकते। निर्भया,आसिफा और उन्नाव की पीड़िता के नाम तो केवल मिसाल के लिए हैं।
प्रताड़ना से जुड़े ऐसे अपराधों के लिए सख्त कानून बनाये जाने,नाबालिग के साथ दुष्कर्म पर फांसी की सजा का प्रावधान किये जाने,फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या बढ़ाकर पीड़िता को शीघ्र न्याय और अपराधी को सजा दिलाये जाने,ऐसे मामलों की सुनवाई महिला जज द्वारा कराये जाने,पीड़ित महिला के बयान या पत्र को प्रामाणिक सबूत मानने क्रास एग्जामिनेशन की प्रक्रिया को खत्म करने और ऐसी घटनाओं में संलिप्त व्यक्तियों की पहचान सार्वजनिक किए जाने की दिशा में सरकार ने कुछ कड़े कदम उठाए हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ है,जो करना बाकी है।
यह समझ लेना भी जरूरी है कि,समाज के अंदर बदलाव केवल सरकार,प्रशासन और कानून के भरोसे नहीं हो सकता। सामाजिक बदलाव के लिए समाज के लोगों को आगे आना होगा…।
बेहद जरूरी है कि,हम सब उन्नाव की बेटी के दर्द को महसूस करें…। समाज और राजनीति के अंदर पनप रहे इस नकारात्मक संकेत को समझने की कोशिश करें और अपनी चुप्पी तोड़ें…।

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