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अर्ध नारीश्वर

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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तू नारी हम पुरुष,
तू जीवन हम रूह
तू जननी हम सर्जक,
तू नव किसलय हम तरु
तू श्रद्धा हम साधक,
तू लज्जा हम वाहक
तू ममता हम नायक,
हम नौका तू पतवार
तू करुणा हम साहस,
तू कशिश हम अहसास,
हम जीवन तू मुस्कान
तू शक्ति हम संधान,
तुम मानी हम तेरा स्वाभिमान
तू खुशबू हैं हम फूल,
हम सलिल तू सरिता
मृत्तिका से जुड़े द्रुम या लता,
तना शाखा या फल फूल
सब साथ बना जीवन पादप,
हैं होते पृथक् सभी के रंग-रूप
हैं परस्पर अलग औचित्यहीन,
बस,अहं है हेतु तिरष्करण
लक्ष्य एक है जिंदगी संवहन,
अविरल धारा प्रवाहन सीमित पल
वक्त के अहर्निश दृष्टिपथ,
स्नेह साहस धैर्य ममता साथ ले
यायावर हम नवयुग निर्मातृ बन,
गाएँ दोनों मिलकर नवगीत स्वर
आओ सजाएँ गुलिस्तां चारु चमन,
बन तू सुरभित कुसुम हम हों भ्रमर
मिलकर करें रुचिकर मनोहर,
आगमन सुकार्य समधुर ध्येय पथ
छोड़ो विगत अवसाद को,आगे बढ़ें,
माधुर्य सह अनुराग से सहयोग कर
दो पंख बन जीवन गगन ,
उन्मुक्त हो आनंद से उड़ानें भरें
बन अरुणिमा नव जागरण,
करें नव भविष्य का निर्माण
अर्द्धनारीश्वर बने उमेश भी,
करते निरत लोक कल्याण
तट उभय बीच हो प्रवाहक,
तू सलिल हम अविरल धार
नर-नारी मिलकर करते सदा,
तू धरा हो हम धारक बनें,
करें नव जीवन का आधान।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥