राधा गोयल
नई दिल्ली
***********************************
“बच्चों! कभी सुना है कि कोई ऐसी जनजाति भी है हमारे देश भारत में, जो नवरात्र नहीं मनाती ? जो महिषासुर की पूजा करती है ?”
“यह तो बिल्कुल नई बात सुन रहे हैं। ऐसी जनजाति कहाँ है भला ?”
“ऐसी जनजाति पश्चिम बंगाल में है।”
“लेकिन पश्चिम बंगाल में तो दुर्गा पूजा बहुत धूमधाम से मनाई जाती है।”
“बिल्कुल ठीक कहा कि पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा सबसे बड़ा त्यौहार है; लेकिन एक खास तबके के लोग उत्सव में शामिल होने के बजाय शोक में डूबे रहते हैं।”
“कौन है भैया ये लोग ?
“ये हैं राज्य के उत्तरी हिस्से में असम की सीमा से लगे अलीपुरदुआर जिले के माझेरबाड़ी चाय बागान इलाके में रहने वाले असुर जनजाति के लोग। इनका दावा है, कि ये महिषासुर के वंशज हैं और देवी दुर्गा ने उनके पूर्वज का वध किया था। इसलिए यह समय खुशी का नहीं, दु:ख का है। इस जनजाति के लोग पूजा के दौरान नये कपड़े नहीं पहनते हैं। न ही तस्वीरें खिंचवाते हैं। यहाँ के अलावा झारखंड और बिहार के कुछ इलाकों में भी इस जनजाति के लोग रहते हैं। अपने पूर्वजों से सुनी लोक गाथा पर इन्हें इतना भरोसा है कि हजारों साल बाद भी इसे मानते हैं। इनकी लोक गाथा हिंदी पुराणों में वर्णित देवी दुर्गा और महिषासुर के युद्ध की कहानी के बिल्कुल विपरीत है। इनका मानना है जैसा कि चाय बागान में रहने वाले रंजन असुर ने बताया।”
“यह क्या नाम हुआ रंजन असुर ?”
“हाँ, यह लोग अपने नाम के पीछे असुर लगाते हैं। तो रंजन असुर के अनुसार राजा महिषासुर के समय महिलाओं को बेहद सम्मान से देखा जाता था। उसने कहा कि ऐसे में हमारे राजा किसी नारी से युद्ध तो दूर, हथियार भी नहीं उठा सकते थे। उनके अनुसार महिषासुर स्वर्ग और पृथ्वी दोनों जगह सबसे ज्यादा ताकतवर थे। देवताओं को लगता था कि अगर महिषासुर लंबे समय तक जीवित रहा तो लोग देवताओं की पूजा करना छोड़ देंगे। बागान में रहने वाले दारू असुर के अनुसार षष्ठी से दशमी तक वह लोग मातम मनाते हैं। इस दौरान तमाम काम रात में ही निपटाते हैं। दिन में घर से बाहर भी नहीं निकलते। महिषासुर के वध के बाद उनके पूर्वजों ने देवताओं की पूजा बंद कर दी।”