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आज पत्रकारिता की डिग्री तो है,लेकिन जानकारी नहीं होने से उल्टा हो रहा

 देअविवि में `डिजिटल मीडिया और हिन्दी:संभावनाएं एवं चुनौतियां` पर संगोष्ठी में बोले श्री आर्य

 

इंदौरl

पुराने पत्रकारों के पास पत्रकारिता की डिग्री नहीं होती थी,लेकिन जानकारी पूरी होती थी। आज पत्रकारों के पास पत्रकारिता की डिग्री तो होती है,लेकिन जानकारी नहीं होती है,यह उल्टा काम हो रहा है।

यह बात देवी अहिल्या विश्वविद्यालय की पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में पहले दिन २८ मार्च को गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष एवं डिजिटल डाटा के महारथी उमेश आर्य ने कहीl मौका था डिजिटल मीडिया और हिंदी:सम्भावनाएं और चुनोतियाँ विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम दिन की शुरुआत काl इस उदघाटन सत्र की शूरुआत दीप प्रज्जवलन व विश्वविद्यालय के कुलगीत के साथ हुई।

इस मौके पर विवि के कुलपति डॉ.नरेंद्र धाकड़ ने कहा कि,वह दिन दूर नही है जब क्लासेस नही होंगी,बल्कि डिजिटल तरीके से पढ़ाई होगीl संस्कार के बिना कोई भी पत्रकार सफल नहीं हो सकता है। पत्रकारिता में उच्चारण भी ज्यादा जरूरी है। मीडिया में भी जो अच्छी और सही जानकारी आना चाहिए,वह नहीं आती है।

संगोष्ठी के विषय डिजिटल मीडिया और हिंदी:सम्भावनाएं और चुनोतियाँ पर डॉ.धाकड़ ने कहा कि आज मिर्च-मसाले वाले समाचार प्रमुखता के साथ छप जाते हैं।

डॉट कॉम के सम्पादक सुधीर गोरे ने कहा कि,वर्ष २०१६ से १८ के दौर में एंड्रॉयड एप्लीकेशन ने हम सभी को इंफॉर्मेशन के हाई-वे पर लाकर खड़ा कर दिया है। रेडियो को ५० लाख लोगों तक पहुंचने में ८ वर्ष का समय लगा था,जबकि डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू को ५० लाख लोगों तक पहुंचने में केवल २ साल का समय लगाl इसके साथ ही टेलीकम्युनिकेशन को जनता के बीच पहुंचने में १३ साल का लंबा समय लगा है। आज हमारे देश में ८० प्रतिशत रीडर मोबाइल पर उपलब्ध है। पत्रकारिता के लिए कंटेंट सोर्स रेलीवेंसी और क्वालिटी की जरूरत है।

हिंदी पोर्टल के मनोरंजन संपादक समय ताम्रकर ने कहा कि,भारत में पोर्टल का भविष्य बहुत उज्ज्वल है हर दिन ९० प्रतिशत से ज्यादा रीडरशिप हिंदी पोर्टल की बढ़ती जा रही है। गूगल को भी यह बात समझ में आ गई है। यही कारण है कि आज बहुत तेजी के साथ पोर्टलों का विकास हो रहा है। अंग्रेजी में मात्र १४ प्रतिशत की दर से ही पाठक बढ़ पा रहे हैं। अब पोर्टल के काम में कई बड़े खिलाड़ी आ गए हैं। इनके आने का भी कारण यही है कि आने वाला समय इन पोर्टल का ही समय है और खास तौर पर हिंदी पोर्टल का समय है।

इस मौके पर इस संगोष्ठी की आयोजक-समन्यवयक और विभागाध्यक्ष डॉ.सोनाली नरगुंदे ने कहा कि यह पहला मौका है जब इस अध्ययनशाला में इस तरह की अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी की गई है। वर्तमान समय डिजिटल मीडिया का समय है। ऐसे में हम इस संगोष्ठी के माध्यम से यह समझना चाहेंगे कि,डिजिटल मीडिया में हिंदी का स्थान क्या है और आगे उसके लिए संभावनाएं कितनी हैं। उदघाटन सत्र का संचालन आभा निवसरकर ने कियाl आभार डॉ.कामना लाड़ ने माना।

खैरियत पूछने का जमाना गया साहब…

तकनीकी सत्र के प्रथम भाग में १७ शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र का वाचन किया। शोध पत्र के विषय डिजिटल मीडिया व हिंदी:चुनौतियां एवं संभावनाएं से संबंधित थे। संचार माध्यम,हिंदी भाषा और स्वतंत्रता,शाब्दिक त्रुटियां,सोशल मीडिया में हिंदी की उपयोगिता,हिंदी में विश्लेषण,पत्रकारिता और प्रभाष जोशी जैसे कई विषयों पर शोधार्थियों ने शोध प्रस्तुत किएl इन्होने कहा कि खैरियत पूछने का जमाना गया साहब,आदमी ऑनलाइन दिख जाए तो सब ठीक है। जब प्रयोग की बात आती है तो हम हिंदी की जगह अंग्रेजी भाषा को अपनाना पसंद करते हैं,वह भी भारत में रहते हुए। इस प्रथम तकनीकी सत्र का संचालन दिव्या हुरकत ने किया। तकनीकी सत्र के द्वितीय भाग में तीन शोधार्थियों ने अपने शोध-पत्र का वाचन किया। शोधार्थियों ने बताया कि,डिजिटल मीडिया की वजह से डॉक्यूमेंट्री का व्यू बड़ा है,और डिजिटल मीडिया की वैल्यू के बारे में चर्चा हुई। विषय विशेषज्ञ के रूप में संजीव गुप्ता(माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय,भोपाल),कला जोशी(अटल बिहारी वाजपेयी शासकीय महाविद्यालय, इंदौर) एवं जयति मिश्रा(एमिटी यूनिवर्सिटी,जयपुर) मौजूद रहे। अतिथियों ने विषय पर अपना विश्लेषण बताते हुए संजीव गुप्ता ने कहा कि,अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी एक बारात जैसी होती है,जिसमें दूल्हे से लेकर बाराती तक सब सज-संवर कर आते हैं इसलिए सभी शोधार्थियों ने अति विशिष्ट शोध प्रस्तुत किया है। कला जोशी ने अपना विश्लेषण बताते हुए कहा कि यहां आकर अनुभव हुआ कि शोध की सार्थकता क्या होती हैl विश्व मंच पर हिंदी की ताकत बढ़ रही है और उसका कारण कहीं ना कहीं देश का युवा है। मीडिया और डिजिटल मीडिया की नाव पर सवार होकर यह युवा ही हिंदी की नौका को पार लगाएगा।

शोध बहुत गंभीर विषय-श्री धामणकर

विषय विशेषज्ञ के रूप में विश्लेषण करते हुए नागपुर विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष धर्मेश धामणकर ने बताया कि,रिसर्च एक बहुत सीरियस विषय हैl रिसर्च का ऑब्जेक्ट, की वर्ड, मेथोडोलॉजी होती है,लेकिन इसका अभाव दिखता है तो उमेश आर्य ने कहा कि १०० खबरों के आधार पर भी शोध हो सकता है,लेकिन अगर हम ज्यादा से ज्यादा खबरों के आधार पर शोध करेंगे तो उसका प्रभाव दिखेगा। शोध में फैक्ट्स और फिगर पर काम करना आवश्यक है। महारानी लक्ष्मीबाई स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष संध्या गंगराड़े ने बताया कि शोध की सामग्री विषय के अनुरूप होना चाहिएl विषय का भटकाव बताता है कि,शोध पूरे मन और लगन से नहीं की।