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कब तक जलेंगे रावण और होलिका ?

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन(हिमाचल प्रदेश)
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प्रत्येक वर्ष दशहरे पर रावण का दहन और होली पर होलिका का दहन आदिकाल से करते आ रहे हैं और यह प्रथा आज भी जारी है। रावण प्रकाण्ड विद्वान था, उसने सीता जी का हरण किया और और अंत में प्रभु श्रीराम द्वारा दंडित किया गया। होलिका भी अपने भाई हिरणकश्यप को बचाने हेतु अपने भतीजे प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई। होलिका को यह वरदान था कि, आग उसको नहीं जला सकती है, परंतु उद्देश्य गलत था। इसलिए, अग्नि देव ने होलिका का साथ नहीं दिया और होलिका जलकर स्वाह हो गई। यानी प्रकृति ने होलिका को दंडित किया।
रावण और होलिका ने जिंदगी में एक बार गलती की, लेकिन प्राचीन काल से अब तक उनको सजा दी जा रही है। अर्थात प्रत्येक वर्ष उनका दहन किया जाता है। हमने रावण और होलिका को बुराई का पर्यायवाची मान लिया है।
होलिका और रावण दहन करने वालों से पूछना चाहता हूँ कि, वे कितने पवित्र हैं ? अपने गिरेबान में झांकें। एक क्या, हजारों गलतियाँ की है और रोज किए जा रहे हैं, फिर भी रावण को मारे जा रहे हैं।इस दुनिया का यह नियम है कि, जो पकड़ा गया वो चोर, जब तक नहीं पकड़ा गया शरीफ है।
रावण और होलिका को अपने कर्मों की सजा उसी काल में मिल चुकी है। हर साल हम उनका दहन करके देश के अरबों रुपयों के साथ अपना अमूल्य समय भी नष्ट करते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति में कुछ
अच्छाई और कुछ बुराई होती है। सबका ध्यान बुराइयों की तरफ पहले जाता जाता है। प्रत्येक वर्ष हम रावण और होलिका का दहन करके क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? क्या इनको जलाने से बुराई का अंत हो जाएगा ? कभी नहीं।इसके लिए हमको अपनी विचारधारा में परिवर्तन करना होगा।
आइए, आज हम एक संकल्प लें कि, यदि हमें बुराइयाँ देखनी है तो केवल अपनी बुराई देखकर उनसे प्रेरणा लेंगे। अपना जीवन आदर्श बनाएंगे और रावण तथा होलिका दहन जैसी परंपराओं को खत्म करेंगे।

परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी(हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस.,एम.ए.,एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका,व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह)प्रकाशित है। आपको राजस्थान द्वारा ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष(सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके।”