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कैसे लोग चला देते हैं बच्चों पर शमशीर

वकील कुशवाहा आकाश महेशपुरी
कुशीनगर(उत्तर प्रदेश)

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सोच-सोच कर मन यह मेरा होता रोज अधीर,
कैसे लोग चला देते हैं बच्चों पर शमशीरl

कैसे उसको पाला होगा,
पल-पल उसे सम्हाला होगाl
बिना खिलाये माँ के मुँह तक,
जाता नहीं निवाला होगाl
हल्की-सी भी चोट लगे तो माँ को उठती पीर-
कैसे लोग चला देते हैं बच्चों पर शमशीर…ll

सोच-सोच मुस्काना उसका,
गोदी में छुप जाना उसकाl
कितना तड़पायेगा हर पल,
आँगन में तुतलाना उसकाl
जो आँखों का तारा था,वह बेदम हुआ शरीर-
कैसे लोग चला देते हैं बच्चों पर शमशीर…ll

लोगों ने जब मारा होगा,
उसने मुझे पुकारा होगाl
आगे-पीछे दाएँ-बाएँ,
चारों तरफ़ निहारा होगाl
उसे छोड़कर मेरा सीना देते चाहे चीर-
कैसे लोग चला देते हैं बच्चों पर शमशीर…ll

संस्कारित परिवेश नहीं है,
न्याय बचा कुछ शेष नहीं हैl
हत्यारे सब घूम रहे पर,
फाँसी का आदेश नहीं हैl
यह कैसी हम देख रहे हैं भारत की तस्वीर-
कैसे लोग चला देते हैं बच्चों पर शमशीर…ll

परिचय-वकील कुशवाहा का साहित्यिक उपनाम आकाश महेशपुरी है। इनकी जन्म तारीख २० अप्रैल १९८० एवं जन्म स्थान ग्राम महेशपुर,कुशीनगर(उत्तर प्रदेश)है। वर्तमान में भी कुशीनगर में ही हैं,और स्थाई पता यही है। स्नातक तक शिक्षित श्री कुशवाहा क़ा कार्यक्षेत्र-शिक्षण(शिक्षक)है। आप सामाजिक गतिविधि में कवि सम्मेलन के माध्यम से सामाजिक बुराईयों पर प्रहार करते हैं। आपकी लेखन विधा-काव्य सहित सभी विधाएं है। किताब-‘सब रोटी का खेल’ आ चुकी है। साथ ही विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आपको गीतिका श्री (सुलतानपुर),साहित्य रत्न(कुशीनगर) शिल्प शिरोमणी सम्मान(गाजीपुर)प्राप्त हुआ है। विशेष उपलब्धि-आकाशवाणी से काव्यपाठ करना है। आकाश महेशपुरी की लेखनी का उद्देश्य-रुचि है।