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जब ज़मीर शरमाया मेरा

संजय गुप्ता  ‘देवेश’ 
उदयपुर(राजस्थान)

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कोई दो कदम तो साथ रहे मेरे भी,
इस उम्मीद में खोजता रहा वह चेहरा।
संग चलने को मेरे जो तैयार हुआ,
वह फकत साथ था साया ही मेरा।

रात को दस्तक दी,सपने में जिसने,
दिन में वही शख्स था भुलाया मेरा।
छोड़ के दामन मेरा,दूर हुआ मुझसे,
वह था कोई,बहुत आजमाया मेरा।

छुपता फिरा खुद से,ढूंढ लेता हर कोई,
कौन है वह शख्स,पता बताया मेरा।
दिल ने एतबार किया मेरी साँसों पर,
उसी साँस से फिर,दिल घबराया मेरा।

भलाई गैर मुद्दों से,दूर रहने में समझी,
उनके फटे में,जब पांव फंसाया मेरा।
बरसती हूई आँखों का साथ कब तक,
सोचकर फिर ये दिल मुस्कुराया मेरा।

नया साथी है,भूला हूँ फूलों की बेरूखी,
काँटों ने जब यह बिस्तर बिछाया मेरा।
दुआओं से थी उम्मीद मेरे इस दिल को,
पर फकीरी रहा सदा ही सरमाया मेरा।

सबूत मांगेंगे लोग कितना मैं भटका हूँ,
पाँव के छालों ने बहुत लहू बहाया मेरा।
पागल झूमेगा कोई खुद के जनाजे में,
हर जहन में तब,क्यों नाम आया मेरा।

कोशिशों पर मेरी ठहाके लग ही चुके हैं,
नाकामी पर क्यों,तमाशा बनाया मेरा।
‘देवेश’ बीते कुछ पल गैरतमंदों के साथ,
नजर झुकी थी जब ज़मीर शरमाया मेरा॥

परिचय-संजय गुप्ता साहित्यिक दुनिया में उपनाम ‘देवेश’ से जाने जाते हैं। जन्म तारीख ३० जनवरी १९६३ और जन्म स्थान-उदयपुर(राजस्थान)है। वर्तमान में उदयपुर में ही स्थाई निवास है। अभियांत्रिकी में स्नातक श्री गुप्ता का कार्यक्षेत्र ताँबा संस्थान रहा (सेवानिवृत्त)है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप समाज के कार्यों में हिस्सा लेने के साथ ही गैर शासकीय संगठन से भी जुड़े हैं। लेखन विधा-कविता,मुक्तक एवं कहानी है। देवेश की रचनाओं का प्रकाशन संस्थान की पत्रिका में हुआ है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-जिंदगी के ५५ सालों के अनुभवों को लेखन के माध्यम से हिंदी भाषा में बौद्धिक लोगों हेतु प्रस्तुत करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-तुलसीदास,कालिदास,प्रेमचंद और गुलजार हैं। समसामयिक विषयों पर कविता से विश्लेषण में आपकी  विशेषज्ञता है। ऐसे ही भाषा ज्ञानहिंदी तथा आंगल का है। इनकी रुचि-पठन एवं लेखन में है।