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जिंदा रखता प्रेम ही

अवधेश कुमार ‘आशुतोष’
खगड़िया (बिहार)
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गज की अनुपम एकता,नहीं जरूरत साध्य।
उस एका के सामने,केहरि भी हो बाध्यll

एका ही वह ढाल है,जिससे रक्षा कौम।
सोलह आने सत्य यह,तिमिर नाश ज्यों भौमll

जिसके दिल में है नहीं,प्रेम दया सदभाव।
वह वैसे ही डूबता,ज्यों पानी में नावll

जिसने दु:ख जग का समझ,अपनाया संन्यास।
उसका दु:ख बादल छँटा,हरपल है उल्लासll

जिसका मन हरि में रमा,हरि जपता हर श्वांस।
उसके तो हर रोम में,छा जाता उल्लासll

मुख में रक्खे राम को,रखे छुरी भी पास।
वैसे कपटी लोग से,दूर रहे उल्लासll

प्रेम समर्पण भाव है,प्रेम सुधा रसधार।
जिंदा रखता प्रेम ही,हर जीवन संसारll

षोडश की नवयौवना,शोभा अगम अनूप।
हर दिन सुंदरता बढ़े,चन्द्रकला समरूपll

अगर प्रेम होता नहीं,धरती पर आबाद।
हिल जाती हर जीव की,अपनी ही बुनियादll

चींटी की तो एकता,प्रेरक इस संसार।
भिड़ जाती जब झुंड में,नहीं मानती हारll

खंजर हाथों में लिए,वह करने को वार।
सबक सिखा दो तुम उन्हें,जो ऐसा गद्दारll

भारत सदियों तक रहा,जंजीरों में बंद।
दुश्मन से दोषी अधिक,अपना ही जयचंदll

होगा मेरी लाश पर,टुकड़ा भारत देश।
रखी रही उदघोषणा,बदल गया परिवेशll

कर सेवा साहित्य की,निश्छल या बिन स्वार्थ।
तुम्हें स्वतः मिल जायगा,जीते जी परमार्थll

बिन मिहनत पानी बिना,चमन नहीं गुलजार।
मिहनत की सौंधी महक,सुरभित है संसारll

परिचय-अवधेश कुमार का साहित्यिक उपनाम-आशुतोष है। जन्म तारीख २० अक्टूबर १९६५ और जन्म स्थान- खगरिया है। आप वर्तमान में खगड़िया (जमशेदपुर) में निवासरत हैं। हिंदी-अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले आशुतोष जी का राज्य-बिहार-झारखंड है। शिक्षा असैनिक अभियंत्रण में बी. टेक. एवं कार्यक्षेत्र-लेखन है। सामाजिक गतिविधि के निमित्त साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेते रहते हैं। लेखन विधा-पद्य(कुंडलिया,दोहा,मुक्त कविता) है। इनकी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है, जिसमें-कस्तूरी कुंडल बसे(कुंडलिया) तथा मन मंदिर कान्हा बसे(दोहा)है। कई रचनाओं का प्रकाशन विविध पत्र- पत्रिकाओं में हुआ है। राजभाषा हिंदी की ओर से ‘कस्तूरी कुंडल बसे’ पुस्तक को अनुदान मिलना सम्मान है तो रेणु पुरस्कार और रजत पुरस्कार से भी सम्मानित हुए हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-हिंदी की साहित्यिक पुस्तकें हैं। विशेषज्ञता-छंद बद्ध रचना (विशेषकर कुंडलिया)में है।

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