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तब कद्र न जानी

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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तारों की थी चमक सब तुमसे,
चंदा का था तुमसे शीतल नूर
सूरज की उष्मित उजियाली थी तुमसे,
आखिर क्यों चले गए तुम मुझसे दूर ?

रूठना-मनाना सब चला रहता था,
अब क्यों किया तूने यूँ गर्व गरूर ?
एक तो मौका देती तुम शेष मुझे,
बस बता देती मुझसे मेरा कसूर।

दरिया की छलकती-सी लहरें थी तुमसे,
तुम्हारी हँसी से उठते थे सब ज्वार भाट
तब लड़-भिड़ कर भी तुमसे खिन्नता न थी,
अब बिन लड़े-भिड़े भी रहा कुछ भीतर काट।

देख विडंबना तू इस बेनौले से संसार की,
सब खोने के बाद ही समझ में कुछ आता है
पास था जब कोई अपने तब कद्र ही न जानी,
खो जाने के बाद इंसान बहुत ही पछताता है।

कोयल की सी मीठी आवाज थी तेरी,
मक्खन से मखमली कोमल नजारे थे
ता-उम्र का सफ़र निभाने की कसमें थी,
मेरी जिन्दगी के तुम आला सदरे थे।

तब तो लगता था सब सुंदर और शीतल,
अब भीषण आग-सा सब-कुछ जलता है।
हाथ से छोड़ी हुई को सिट्टी से बुलाने वाला,
अन्ततः हाथ हमेशा बस यूँ ही तो मलता है॥

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