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तालिबान पूरी दुनिया के लिए खतरा

रोहित मिश्र
प्रयागराज(उत्तरप्रदेश)
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हाल ही में समाचारों में अफगानिस्तान की खबर छाई हुई है। कुछ ही दिन में अफगानिस्तान पर तालिबान की अप्रत्याशित जीत से पूरी दुनिया दंग रह गई है कि जिस तालिबान के पास न टैंक है,न तोप है,वो आधुनिक हथियारों से युक्त अपने से ५ गुनी बड़ी अफगान सेना से कैसे जीत गई ? उस अफगान सेना से,जिसे विश्व के सबसे ताकतवर देश अमेरिका ने तैयार किया था,जिसके पास वायुसेना भी थी।
सुनने में मिलता था कि अफगान वायु सेना की सर्जिकल स्ट्राइक में २००-३०० तालिबान आतंकी मारे गए,क्या ये सब झूठ था ? लग तो ऐसा ही रहा है,क्योकि एयर स्ट्राइक होने के बाद घटनास्थल से सबूत मिलने पर ही संख्या का जिक्र होता है, जबकि अफगान सेना तो एक के बाद एक इलाके हारती जा रही थी।
क्या अफगान सरकार इस तरह की खबर चलाकर तालिबान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना रही थी ? जवाब है नहीं…,क्योंकि तालिबान का दूरसंचार माध्यमों से नाता ही नहीं है,जो वो इसे सुनकर टूट जाते।
असल में अफगान सरकार पूरी दुनिया को बेवकूफ बना रही थी,ताकि दुनियाभर से उससे हमदर्दी रखने वाले उसके बैंक बैलेंस को भरें। साढ़े ३ लाख की फौज का एकाएक गायब हो जाना भी बिल्कुल समझ से परे है। एक बात जरूर है कि जिस देश में अमेरिका अपने सैन्य अड्डे बना लेता है,उस देश की सैन्य ताकत कमजोर हो जाती है। कारण उस देश का अमेरिका के ऊपर अत्यधिक आत्मनिर्भर हो जाना है। जैसे सऊदी अरब की सेनाएं हाऊती विद्रोहियों से जंग नहीं जीत पा रही है।
अफगानिस्तान में भ्रष्टाचार भी बहुत बड़ी समस्या है,जिसका जीता-जागता उदाहरण तालिबानी आतंकियों का काबुल के जिम,पार्क और गेस्टहाउस में उछल-कूद करना है। देखकर ऐसा प्रतीत होता है,जैसे आतंकियों ने यह सब पहली बार देखा हो। यानि ये सुविधाएं पूरे देश में सिर्फ काबुल में ही थी। इस हिसाब से काबुल के कुछ हिस्सों को छोड दिया जाए तो अफगानिस्तान के बाकी इलाकों में विकास न के बराबर था,जबकि पिछले २० साल में अमेरिका,यूरोपीय और भारत सहित कुछ एशियाई देशों ने अफगानिस्तान पर अरबों-खरबों रुपए खर्च किए,फिर भी अफगानिस्तान के हालात बदतर रहे। अगर यह विकास अफगानिस्तान के गाँव-गाँव तक पहुंचा होता तो शायद आज स्थिति दूसरी होती,क्योंकि तालिबान में सबसे अधिक पश्तून लड़ाके हैं,जो अफगान जनंसख्या का ४२ फीसद है। यानी ये भाग विकास से दूर रहा और धार्मिक कट्टरता की ओर आकर्षित हुआ।
वर्तमान समय में अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं,जो तालिबान को चुनौती दे रहे हैं। सभी देशो को चाहिए कि इनको हरसंभव मदद दी जाए,क्योंकि तालिबान अफगानिस्तान के लिए ही नहीं,बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरा है।