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तुझ जैसी इक माँ…

नताशा गिरी  ‘शिखा’ 
मुंबई(महाराष्ट्र)
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मातृ दिवस स्पर्धा विशेष…………


माँ,
मुझमें भी तो जिन्दा है तुझ जैसी ही इक माँ।
हाँ माँ,
मुझमें भी तो जिन्दा है तुझ जैसी ही इक माँ।

माना,
माना परिधान बदल दिया है,साड़ी की जगह अब जीन्स ने ली है,
क्या परिधान मात्र से मेरा वजूद खतरों में बतलायेंगे।

देखो,
लोगों ने आरोप लगाया,आधुनिक माँ के बच्चे आँचल से वंचित हैं,
क्या वस्त्र मात्र से मेरी त्याग-तपस्या अर्पित जीवन सब मिथ्या बन जाएँगे।
कह दो न माँ,मुझमें भी तो जिन्दा है तुझ जैसी ही इक माँ।

फर्क बस इतना-सा है तू दूध कटोरी ले के मेरे पीछे भागा करती थी,
मैं कापी-किताब लिए भागी फिरती हूँ…
हाँ माँ…मुझमें भी तो जिन्दा है तुझ जैसी ही इक माँ।

माघ-पूस की रात की जो तेरी कहानी थी,वही मुझको भी दुहराई है,
दाखिला हम पा जाते थे,स्कूल में कितनी आसानी से…
अब तो माथा गर्म कर दिया है स्कूल की मनमानी ने।

क्या-क्या न बतलाऊं माँ और कैसे न कह दूँ,
मुझमें भी तो जिन्दा है तुझ जैसी ही इक माँ।

जितना पाठ रटा नहीं हमने,अपने बचपन के मौसम में,
उससे ज्यादा अब जगी हूँ कामों की कहानी में।

आता था अपना परिणाम-पत्र उतना न घबराती थी,
जितना अब धूप-अगरबत्ती दिखलाती हूँ।

हम बच्चे कितने अच्छे थे,
सारी परिस्थितियाँ भांप जाया करते थे तेरी कही कहानी से…
अब इन बुद्धिजीवी बच्चों ने माथा कितना भरमाया है।

पहले स्पर्धा नहीं थी सच्ची माँ की कहानी की,
अब तो परिभाषा ही बदल रही है माँ से मम्मा तक जुबानी की।

माँ,
मुझमें भी तो जिन्दा है तुझ जैसी ही इक माँ।
हाँ माँ,बस कह दो,तुझमें भी तो जिन्दा है मुझ जैसी ही इक माँll

परिचय-नताशा गिरी का साहित्यिक उपनाम ‘शिखा’ है। १५ अगस्त १९८६ को ज्ञानपुर भदोही(उत्तर प्रदेश)में जन्मीं नताशा गिरी का वर्तमान में नालासोपारा पश्चिम,पालघर(मुंबई)में स्थाई बसेरा है। हिन्दी-अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाली महाराष्ट्र राज्य वासी शिखा की शिक्षा-स्नातकोत्तर एवं कार्यक्षेत्र-चिकित्सा प्रतिनिधि है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत लोगों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की भलाई के लिए निःशुल्क शिविर लगाती हैं। 
लेखन विधा-कविता है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-जनजागृति,आदर्श विचारों को बढ़ावा देना,अच्छाई अनुसरण करना और लोगों से करवाना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद और प्रेरणापुंज भी यही हैं। विशेषज्ञता-निर्भीकता और आत्म स्वाभिमानी होना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अखण्डता को एकता के सूत्र में पिरोने का यही सबसे सही प्रयास है। हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा घोषित किया जाए,और विविधता को समाप्त किया जाए।”