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धरती

बाबूलाल शर्मा
सिकंदरा(राजस्थान)
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(विशेष चिन्ह ‘…..’ से प्रदर्शित शब्द धरती के पर्यायवाची हैं।)
धारण करती है सदा,जल थल का संसार।
जननी जैसे पालती,धरती जीवन धारll

भूमि उर्वरा देश की,उपजे वीर सपूत।
भारत माँ सम्मान हित,हो कुर्बान अकूतll

पृथ्वी,पर्यावरण की,रक्षा कर इन्सान।
बिगड़ेगा यदि संतुलन,जीवन खतरे जानll

धरा हमारी मातु सम,हम है इसके लाल।
रीत निभे बलिदान की,चली पुरातन कालll

भू पर भारत देश का,गौरव गुरू समान।
स्वर्ण पखेरू शान है,आन बान अरमानll

रसा रसातल से उठा,भू का कर उपकार।
धारे रूप वराह का,ईश्वर ले अवतारll

चूनर हरित वसुंधरा,फसल खेत खलिहान।
मेड़ मेड़ जब पेड़ हो,हँसता मिले किसानll

वसुधा के श्रंगार वन,जीवन प्राकृत वन्य।
पर्यावरण विकास से,मानव जीवन धन्यll

अचला चलती है सदा,घुर्णन से दिन-रात।
रवि की करे परिक्रमा,लगे साल संज्ञातll

`क्षिति जल पावक अरु गगन,संगत मिले समीर।
जीव-जीव में पाँच गुण,धारण,तजे शरीरll

वारि इला पर साथ ही,प्राण वायु भरपूर।
इसीलिए जीवन यहाँ,सुन्दर प्राकृत नूरll

मानस मानुष ‘मेदिनी’,बचे,बचे संसार।
संरक्षण कर ले सखे,रखें कुशल आचार॥

रखें ‘विकेशी’ मान को,निज माता सम मान।
जगत मातु रखिए सखे,लगा प्रदूषण आन॥

‘क्षमा’ क्षमा करती सदा,मानव के अपराध।
हम भी मिल रक्षण करें,सबके मन हो साध॥

पेड़ ‘अवनि’ की शान है,शीतल देते छाँव।
प्राणवायु भरपूर दे,लगा नगर पथ गाँव॥

भरते निर्मल बाँध सर,हरे ‘अनंता’ ताप।
नीर प्रदूषण है सखे,हम सबको अभिशाप॥

वारि अन्न जीवन वसन,दिए सर्व सुख शान।
रहें तभी ‘विश्वंभरा’,रक्षण मय सम्मान॥

रखे ‘स्थिरा’ धारण सदा,मानव तेरे भार।
करती निज कर्तव्य वह,कर ले कर्म सुधार॥

वृक्ष ‘धरित्री’ पर हरे,वर्षा जल की आस।
खूब लगाओ पेड़ फिर,भावि बने विश्वास॥

‘धरणी’ पर जल है भरा,हिम सागर नद बंध।
खेती,पीने को नहीं,सोच मनुज मतिअंध॥

‘उर्वी’ पर है सिंधु सर,नदिया और पठार।
फसलें कानन पथ भवन,झेले गुरुतम भार॥

देश राज्य सीमा बना,ले हथियार नवीन।
क्यों लड़ते,रहने यहीं,जेवर जोरु ‘जमीन’

धीरज से खोदें खनिज,कर ले भल पहचान।
रहे ‘रत्नगर्भा’ अमर,अविरल रहें प्रमान॥

‘महि’ से रवि शशि दूर है,करते नेह प्रकाश।
चाहे तन से दूर हों,रखो प्रेम विश्वास॥

गंग ‘अदिति’ पर ही बहे,भागीरथी प्रयास।
निर्मल रखनी है सदा,जैसे हरि आवास॥

‘आद्या’ सम हैं नारियाँ,धारक और महान।
सृष्टि चक्र इनसे चले,मत कर नर अपमान॥

‘जगती’ पर जीवन रहे,ईश्वर से अरदास।
जीवन भी साकार तब,होय प्रदूषण नाश॥

सहती ‘धात्री’ देखिए,मानव के अतिचार।
मर्त्य जन्म शुभ कर्महित,कर ले खूब विचार॥

इसी ‘निश्चला’ पर रहें,प्राकृत जीव अनंत।
सुर नर मुनि गंधर्व की,चाह बहार बसंत॥

खोद रहे ‘रत्नावती’,बजरी पत्थर खेत।
मोती माणिक रत्न भी,खोजे स्वर्ण समेत॥

वासुदेव श्रीकृष्ण से,सभी ईश अवतार।
माने माँ सम ‘वसुमती’,वीर मिटाए भार॥
. 👀 ३२ 👀
‘विपुला’ बड़ी विचित्र है,भरे खनिज भरपूर।
खोद जरूरत मानवी,मत कर माँ बेनूर॥

शस्य श्यामला चाहते, ‘श्यामा’ को घनश्याम।
मीरा,राधा श्याम को,सीता चाहति राम॥

सहे सदा माता ‘सहा’,पूत,दुष्ट के दंश।
‘लाल’ मातु के जो कहे,मेटे खल कुल वंश॥

धारे ‘सागरमेखला’, सागर सरिता सेतु।
पर्वत जंगल जीव ये,माता,सुत जन हेतु॥

गौ,गौरैया,गिद्ध गुण,भूल रहा इंसान।
उपयोगी जनजीव ये, ‘गो’ का हर अरमान॥
👀 ३७ 👀
धर्म,जातियाँ गोत्र से,मत कर जनअलगाव।
सूरज ‘गोत्रा’ चंद्र के,रहे एक सम भाव॥

क्यों ‘ज्या’ को अपमानता,स्वारथ में इन्सान।
माता का सम्मान कर,जग है कर्म प्रधान॥

‘इरा’ कभी देनी नहीं,जन्मत सीख सपूत।
रजपूतानी रीति थी,गर्वित जन रजपूत।।

जन्म ‘इड़ा’ पर भाग्य से,कर ले खूब सुकर्म।
स्वर्ग नर्क व्यापे नहीं,समझ धर्म का मर्म॥

लड़े ‘भोम’ हित भोमिया,शीश विहीन कबंध।
शर्मा बाबू लाल के,कुल में पूरा प्रबंध॥

परिचय : बाबूलाल शर्मा का साहित्यिक उपनाम-बौहरा हैl आपकी जन्मतिथि-१ मई १९६९ तथा जन्म स्थान-सिकन्दरा (दौसा) हैl वर्तमान में सिकन्दरा में ही आपका आशियाना हैl राजस्थान राज्य के सिकन्दरा शहर से रिश्ता रखने वाले श्री शर्मा की शिक्षा-एम.ए. और बी.एड. हैl आपका कार्यक्षेत्र-अध्यापन(राजकीय सेवा) का हैl सामाजिक क्षेत्र में आप `बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ` अभियान एवं सामाजिक सुधार के लिए सक्रिय रहते हैंl लेखन विधा में कविता,कहानी तथा उपन्यास लिखते हैंl शिक्षा एवं साक्षरता के क्षेत्र में आपको पुरस्कृत किया गया हैl आपकी नजर में लेखन का उद्देश्य-विद्यार्थी-बेटियों के हितार्थ,हिन्दी सेवा एवं स्वान्तः सुखायः हैl

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