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नवरात्र शक्ति आराधना

दुर्गेश कुमार मेघवाल ‘डी.कुमार ‘अजस्र’
बूंदी (राजस्थान)
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सर्व अमंगल,मंगलकारी,
दुःख-पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव कंटकों में फुलवारी।
अब तो आजा,हे जग माँ तू,
यह दुनिया तुझ ही को पुकारी…॥

स्मरण तेरा शुरू करें हम,
घट को स्थापित करके।
घट-घट में है तू ही बसती,
शक्ति जागृत करके।
अखण्ड जोत तेरी नव दिन बालूं,
मन से ज्ञापित करके।
धूप,अगर और करूँ क्या अर्पण,
तू ही मुझे समझा री।
सर्व अमंगल,मंगलकारी,
दुःख पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव कंटकों में फुलवारी।
अब तो आजा,हे जग माँ तू,
यह दुनिया तुझ ही को पुकारी…॥

भक्ति ये मन की पाट धरूँ माँ,
चौक को पूरित करके।
अन्न अंकुरित करना भी है,
माट में मिट्टी भरके।
झांकी तेरी लगती है निश्छल,
देख-देख मन हरखे।
मन के अब सब,द्वार में खोलूं,
आ इसमें बस जा री।
सर्व अमंगल,मंगलकारी ,
दुःख पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव कंटकों में फुलवारी।
अब तो आजा,हे जग माँ तू,
यह दुनिया तुझ ही को पुकारी…॥

चैत्र-आश्विन ,शुक्ल प्रतिपदा,
पूजन शुरू करें हम।
अगर जला कर ज्योति जलाएं,
अभी मिटे यह जग-तम।
थाल सजा कर करें आरती,
नाचे-गाएँ सब हम।
तेरा साथ रहे अब निश दिन,
आशीष तू अपना लुटा री।
सर्व अमंगल,मंगलकारी,
दुःख पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव कंटकों में फुलवारी।
अब तो आजा,हे जग माँ तू,
यह दुनिया तुझ ही को पुकारी…॥

नव दिन तक नव रूप हैं तेरे,
एक-एक करूँ पूजन।
पूजूँ-गाऊँ तुझे सुनाऊँ,
नव दिन तक और क्षण-क्षण।
महिमा तेरी सब जग जाने,
क्या री करूँ अब वर्णन।
इस जग को सब तू बतलाती,
अब क्या-क्या लिखूं बतला री।
सर्व अमंगल,मंगलकारी,
दुःख पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव कंटकों में फुलवारी।
अब तो आजा, हे जग माँ तू ,
यह दुनिया तुझ ही को पुकारी…॥

नव दिन जग करे शक्ति पासना,
विध-विध रूप की तेरे।
हो ब्रह्मी या गृहस्थ भले हो,
सन्यासी बहुतेरे।
शक्ति सभी को तू वर देती,
मनुज हो दनुज भलेरे।
कन्या रूप को करके पूजित,
जग सिद्धि प्राप्त करे री।
सर्व अमंगल,मंगलकारी,
दुःख पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव कंटकों में फुलवारी।
अब तो आजा,हे जग माँ तू,
यह दुनिया तुझ ही को पुकारी…॥

परिचय–आप लेखन क्षेत्र में डी.कुमार’अजस्र’ के नाम से पहचाने जाते हैं। दुर्गेश कुमार मेघवाल की जन्मतिथि-१७ मई १९७७ तथा जन्म स्थान-बूंदी (राजस्थान) है। आप राजस्थान के बूंदी शहर में इंद्रा कॉलोनी में बसे हुए हैं। हिन्दी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा लेने के बाद शिक्षा को कार्यक्षेत्र बना रखा है। सामाजिक क्षेत्र में आप शिक्षक के रुप में जागरूकता फैलाते हैं। लेखन विधा-काव्य और आलेख है,और इसके ज़रिए ही सामाजिक मीडिया पर सक्रिय हैं।आपके लेखन का उद्देश्य-नागरी लिपि की सेवा,मन की सन्तुष्टि,यश प्राप्ति और हो सके तो अर्थ प्राप्ति भी है। २०१८ में श्री मेघवाल की रचना का प्रकाशन साझा काव्य संग्रह में हुआ है। आपकी लेखनी को बाबू बालमुकुंद गुप्त साहित्य सेवा सम्मान-२०१७ सहित अन्य से सम्मानित किया गया है|

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