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नारी का बदलता स्वरूप

बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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वह नारी थी,
छुई-मुई की तरह अपने में सिमटने वाली
अंकुरित छोटे पौधे की तरह रखती थी मन में अनगिनत स्वप्न।

उसने उपर उठने को,
गर्दन उठायी ही थी कि
जीवन में चली जो कठोर हवाएँ, 
जो गर्माती थी उसके चेहरे को झुलसाती थी
उसके अरमानों को हवा में,
हल्के सूखे पत्तों की तरह उड़ा ले जाती थी। 

पिता के आँगन में वह,
‘बोगनवेलिया’ की तरह बेपरवाह पली-बढ़ी
पर खानाबदोशों की तरह उसे, अपना घर कभी
न कह पाई।

वह पराए घर की दहलीज़ पर,
अपनी पहचान की दस्तक
रेतीले लोगों पर बने पैर के निशानों की तरह,
कभी न दे पाई।

उसके सपने कथरी के धागे की तरह
टूटते चले गए,
उसके मन की अभिलाषा
टूटे प्रेम की तरह छूटती चली गयी। 

वह‌‌ दूसरों की खुशियों की खातिर
अपनी हर चाह भूल बैठी, 
जैसे कोई कोमलांगी गर्म दूध में 
जावन लगाना भूल गयी।

दिनभर काम करके थक जाती है वह,
फिर रात अँधेरी में 
अपनी ही परछाई देख रोती है वह,
एक मुड़ी हुई-सी आकृति देख ड़र जाती है वह। 

चेहरा उसका भले ही हँसता हुआ हो,
पर उस चेहरे के पीछे कई
हजारों चेहरों का दर्द ढोती है वह। 

समाज ने उसके पंखों को कतर कर,
उसे बेसिर-पैर करने की 
कई बार की हैं कोशिशें, 
पर जितनी बार कोशिश हुई है
उतनी ही बार उसने उठा कर
औंधे मुँह पटका है समाज को, 
अपने ही आईने में चेहरा देखने को
मजबूर किया है समाज को।

नारी के बंधन में जकड़े जीवन की 
तस्वीरों को रोते हुए देखा है समाज ने,
अपमानों का हर स्पंदन सहते हुए देखा है उसको।

उसे अबला समझने की 
कई बार भूल की है कुछ दरिंदों ने,
कई बार खानी पड़ी है मुँह की उनको, 
जो दोगले चेहरे लिए घूमते हैं 
अपनी परछाई को छिपाते हुए। 

नारी में शक्ति अपार छिपी है,
ये अपनी परछाई को छिपा कर नहीं 
बल्कि साथ लिए घूमती है। 

जब वह अपनी चेतना की करवट बदलेगी,
दीनता की दीवारों से सर्दी में भी 
पसीना टपकने लगेगा। 

जब वह अपने खोए स्वर को पा लेगी,
उसी दिन स्वाभिमान का दीप
बिना जलाए ही दूर-दूर तक रोशनी देगा।

तब अन्याय की रात अंधेरे में भी,
जुगनू की तरह चमकेगी
नव प्रभात की किरण जब,
कुत्सित आकृतियों को फ्लेश करेगी।
उन्हें उनकी ही आकृति में छिपे,
हजारों चेहरे देखने को मजबूर करेगी॥