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नित अश्क बन नवगीत स्वर हूँ

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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अल्फ़ाज बनकर हर खुशी
अवसाद का आभास हूँ मैं,
अश्क हूँ या नीर समझ
स्नेह का अहसास हूँ मैं।
विरह हो या प्रिय मिलन,
हो सफल या अनुत्तीर्ण क्षण
माता-पिता अवसान हो,
या अंत हो कोई आप्तजन
छलकता नित अम्बु बन,
चक्षु विरत बस कपोल पर
अबाध,अविरल,निष्पंद,
प्रश्न हो निज चाह का
या स्वराष्ट्र के अपमान का,
रक्षक बने दिन-रात सीमाओं पर खड़े
या बलिदान देते सैन्यबल,
कहीं चीखती हों निर्भया
अबला बनीं दुर्दान्त पथ,
वहशी,बेशर्म ज़ालिमों के दंश से
ज़ख्म चाहे कोई भी हो,
ढाये सितम या ज़ुल्म का,
या रोते बिलखते यतीम हो
फुटपाथ पर निर्वस्त्र हो,
या क्षुधार्त दावानल ज्वलित
महसूस बस अन्तःकरण,
बेदर्द हो बस दर्द को निःशब्द बन
आँसू समझ या फिर मुझे,
अभिव्यक्ति का माध्यम सरल
हूँ विविध बहुरंग में या,
यायावर भी सह-सारथी हूँ
विश्रामस्थल मैं बना हूँ श्रान्त का,
हूँ निष्कपट स्वच्छन्द अविरत
प्रवाहक शान्ति शोकानंद का,
अनुपम सरित नित अश्क हूँ।
हर गम का शमन मैं,
पर,हर खुशी का चमन हूँ
संघर्ष हूँ जीवन्त नित,
दुःखान्त का स्तम्भ भी
प्रेरणा हूँ पथ विमुख उदास मन,
प्रेरक सदा उत्थान पथ
आधार हूँ एकान्त में,
अनुभूत गत बीते लम्हें समेटे
अच्छे बुरे अन्तःकरण,
यादों के झरोंखों से
निश्छल सतत् हूँ प्रवाहमान,
निर्माण पथ पर अनवरत
तोय या क्षीर सागर समझ,
पर अश्क मैं प्रतिमान बन
निर्मल मनसि आधान मैं हूँ।
शाश्वत चिरन्तन अनादि मैं,
हूँ निष्कपट स्वर आह्लाद का
विस्मृति सह संस्मृति का,
हो सार पर,निस्तार मैं हूँ।
भावों का प्रकटीकरण या
शोकार्त मन उदगार भी हूँ,
अश्क हूँ मैं प्रियमिलन
अम्ब मातृत्व का जलधार भी हूँ।
स्रोत हूँ मैं उलहना,प्रेम रस उदगार भी हूँ,
सहसा असम्भव प्राप्य पर,
या अफ़सोस निष्फलता सतत
अश्क बन इज़हार भी हूँ।
जलबिन्दु में लघु रूप मैं
पर,सप्तसागर से गह्वरित हूँ,
इश्क भी मैं कशिश भी
ढाये हर ज़ख़म-ए-सितम का
उपहास और अहसास भी हूँ,
दोस्त बनकर हर खुशी मैं,
पर चोट खाये गम से आहतों का,
सारथी सह-हमसफ़र हूँ।
शोक आहत छलित जीवन,
अथाह सिन्धु अवसीदित गह्वर चक्र में
मझधार की पतवार बन,
आगत समय हो सफल चारुतम
नवरंग से परिपूत जीवन,
नवचिन्तना नवनीत हो
जिंदगी नव हर्ष से नवराह का,
नित अश्क बन नवगीत स्वर हूँ॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥