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कहर हर आँगन टूटेगा

अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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मेरा पर्यावरण, मेरी जान (विश्व पर्यावरण दिवस)…

पेड़ों की हरियाली रोती, सूनी होती जा रही,
धरती माँ की कोमल चुनर, धूल में खोती जा रही।

नदियाँ थीं जो जीवनदायिनी, अब मैली कहलाती हैं,
मानव की लापरवाही से, अपनी पीर सुनाती हैं।

कटते वन, उजड़ते उपवन, पक्षी घर को तरस रहे,
अपने ही स्वार्थों में अंधे हम, संकट हैं बरस रहे।

धुआँ-धुआँ सा नभ दिखता है, साँसें भी बोझिल लगतीं,
प्रकृति की चेतावनी सुनकर, दिशाएँ भी मौन-सी रहतीं।

यदि ऐसे ही चलते रहे हम, कल का सूरज रूठेगा,
सूखा, गर्मी और विपदाओं का कहर, हर आँगन टूटेगा।

एक पौधा हर हाथ लगाए, यही समय का नारा है,
धरती को फिर हरा-भरा करना, हम सबका सहारा है।

जल की हर बूँद बचानी होगी, जीवन का सम्मान करो,
प्रकृति के अनुपम उपहारों का, दिल से तुम गुणगान करो।

याद रहे ये केवल भूमि नहीं, माँ का पावन आँचल है,
इसके बिना मनुष्य का जीवन, सूना और निष्फल है।

आओ मिलकर प्रण दोहराएँ, हरियाली फिर लाएँगे,
पर्यावरण बचाकर ही हम, सुंदर कल को पाएँगे।

प्रकृति बचेगी, तभी बचेगा जीवन का संगीत यहाँ,
धरती की रक्षा में ही है मानवता की जीत यहाँ॥