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पीएसपी प्रभाग द्वारा भर्तियों में भाषाई भेदभाव के विरुद्ध याचिका

सेवा में,
विदेश मंत्रालय,
दक्षिण ब्लॉक, केंद्रीय सचिवालय,
नई दिल्ली – ११००११

विषय:-पीएसपी प्रभाग, विदेश मंत्रालय द्वारा राजभाषा अधिनियम, १९६३ एवं राजभाषा नियमों का लगातार उल्लंघन।

महोदय,
   विदेश मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले पीएसपी प्रभाग द्वारा पिछले कई वर्षों से राजभाषा अधिनियम १९६३ और राजभाषा नियमों की अवहेलना करते हुए केवल अंग्रेजी में पत्र जारी किए जा रहे हैं, जो अत्यंत गंभीर और निंदनीय है। इस संबंध में जनता जब शिकायत करती है तो उनका उत्तर भी प्रभाग के अधिकारी नहीं देते हैं। आरटीआई आवेदनों को खारिज करते हैं। प्रभाग में हिन्दी के प्रयोग पर अघोषित प्रतिबंध लगा हुआ है।

राजभाषा अधिनियम एवं नियमों के वे प्रावधान जिनका उल्लंघन किया जा रहा है:

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राजभाषा अधिनियम, १९६३ की धारा ३(३): इस अनिवार्य प्रावधान के तहत केंद्रीय सरकार के मंत्रालयों, विभागों और कार्यालयों द्वारा निकाले जाने वाले प्रशासनिक तथा अन्य संविदों, विज्ञापनों, टेंडर नोटिसों, आदेशों, संकल्पों और प्रेस विज्ञप्तियों आदि को द्विभाषी रूप में एकसाथ हिन्दी-अंग्रेजी का प्रयोग किया जाना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

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राजभाषा नियम, १९७६ का नियम ५: इसके अनुसार केंद्रीय सरकार के कार्यालयों से हिंदी में प्राप्त पत्रों के उत्तर अनिवार्य रूप से हिन्दी में ही दिए जाने चाहिए। प्रभाग हिन्दी में लिखी शिकायतों को कूड़ेदान में फेंक दिया है और ई-मेल को डिलीट कर दिया जाता है।

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राजभाषा नियम, १९७६ का नियम ११: इसके अंतर्गत यह प्रावधान है कि केंद्रीय सरकार के कार्यालयों के सभी फार्म, रजिस्टर, और दस्तावेज द्विभाषी रूप में (अर्थात हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में) तैयार किए जाने चाहिए। पासपोर्ट इंडिया पोर्टल के द्विभाषी नहीं है, हिन्दी व अंग्रेजी में अलग-२ बनाए गए हैं, जिनमें ड्रापडाउन सूची में सभी विकल्प हिन्दी वाले फार्म में भी केवल अंग्रेजी में होते हैं, जबकि ऑनलाइन फार्म को द्विभाषी होना अनिवार्य है।

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राजभाषा नियम, १९७६ का नियम १२: इसके तहत यह उत्तरदायित्व निर्धारित किया गया है कि कार्यालय के प्रशासनिक प्रमुख का यह व्यक्तिगत उत्तरदायित्व होगा कि वह उपर्युक्त नियमों का ठीक प्रकार से अनुपालन सुनिश्चित करे। प्रभाग के प्रशासनिक प्रमुख ने राजभाषा के प्रावधानों का प्रशिक्षण ही नहीं लिया है और इनके प्रभाग के राजभाषा अधिकारी व अनुवादक उल्लंघनों की सूचना प्रशासनिक प्रमुख को नहीं देते हैं।

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वेबसाइट पर अंग्रेजी को प्राथमिकता: प्रभाग की वेबसाइट बाय डिफॉल्ट अंग्रेजी में खुलती है और अंग्रेजी वेबसाइट ही केवल नियमित रूप से अद्यतित की जाती है और धारा ३(३) के अंतर्गत आने वाले सभी १४ दस्तावेज केवल अंग्रेजी में ही अपलोड किए जाते हैं। वेबसाइट के हिन्दी संस्करण का विकल्प छुपा कर दिया गया है, ताकि आम नागरिक उस पर पहुँच ही न सकें, जबकि राजभाषा विभाग के निर्देशानुसार राजभाषा हिन्दी को डिफॉल्ट भाषा बनाना अनिवार्य है या लैंडिंग पृष्ठ पर ही भाषा चयन का विकल्प देना अनिवार्य है।

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पासपोर्ट सेवा का प्रतीक: वर्ष १९६८ से राजभाषा विभाग का निर्देश है कि केंद्र सरकार के सभी लोगो द्विभाषी (एकसाथ हिन्दी-अंग्रेजी में) होंगे, पर पासपोर्ट सेवा का लोगो केवल अंग्रेजी में है और इस संबंध में अनेक नागरिक गत १५-१६ वर्षों से शिकायतें कर रहे हैं पर कोई सुनवाई नहीं है।

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२ जुलाई २००८ के राष्ट्रपति जी के आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए पूर्व विदेश मंत्री दिवंगत श्रीमती सुषमा स्वराज ने वर्ष २०१६ में आदेश जारी किया था कि पासपोर्ट पर नाम, पिता का नाम, पति-पत्नी का नाम देवनागरी लिपि में छापने की व्यवस्था की जाए, पर १० वर्ष बीतने के बाद भी इस आदेश का पालन पीएसपी प्रभाग ने नहीं किया है, क्योंकि प्रभाग के अधिकारी राजभाषा के प्रति सद्भावना नहीं रखते हैं। अन्यथा क्या कारण है कि विदेशी मंत्री के आदेश को भी अनदेखा किया गया।

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द्विभाषी का सही स्वरूप और सेबी का सटीक उदाहरण:
      द्विभाषी का विधिक अर्थ यह है कि प्रत्येक दस्तावेज, रिक्ति विज्ञापन, आदेश या प्रपत्र में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं को समान रूप से और समानांतर स्थान दिया जाए, वह भी एक ही दस्तावेज में। पहले अंग्रेजी का दस्तावेज जारी करना और बाद में उसका अनुवाद संचिका में नत्थी करना राजभाषा अधि का पालन नहीं, सर्वथा उल्लंघन है। इसका उदाहरण भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा जारी संलग्न विज्ञापन है। सेबी के विज्ञापनों और प्रपत्रों में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का एकसाथ और समान उपयोग किया जाता है, जिसमें राजभाषा हिन्दी को प्राथमिकता दी जाती है।

🔹पीएसपी प्रभाग द्वारा भर्तियों और रिक्तियों में भाषाई भेदभाव:
     इसके विपरीत, पीएसपी प्रभाग द्वारा भर्तियों और रिक्तियों में भाषाई भेदभाव चरम पर है, प्रभाग में केवल उन्हीं लोगों को भर्ती किया जाता है जो अंग्रेजी में पारंगत हों इसलिए भर्ती की पूरी प्रक्रिया केवल अंग्रेजी में संचालित की जाती है। इनकी हिन्दी वेबसाइट पर गत ६ वर्षों की भर्तियों के विज्ञापनों की पीडीएफ केवल अंग्रेजी में अपलोड की गई हैं, ताकि अंग्रेजी न जानने वाले लोग भर्ती प्रक्रिया से पहले कदम पर ही बाहर रह जाएँ और वे आवेदन भी न कर सकें।

🔹त्रैमासिक रिपोर्टों का झूठ और राजभाषा कार्यान्वयन समिति:
 ◾त्रैमासिक प्रगति रिपोर्टों की वास्तविक स्थिति: पीएसपी प्रभाग द्वारा कागजों में हिंदी के प्रयोग की झूठी और बढ़ा-चढ़ाकर त्रैमासिक रिपोर्टें भेजी जाती हैं, जबकि धरातल पर स्थिति इसके पूरी तरह विपरीत है। विभाग की वेबसाइट, रिक्ति परिपत्र, आवेदन प्रपत्र और प्रशासनिक आदेश केवल अंग्रेजी भाषा में ही निकाले जा रहे हैं, जो इनकी रिपोर्टों की पोल खोलते हैं।
◾राजभाषा कार्यान्वयन समिति का गठन: नियमों के अनुसार प्रत्येक कार्यालय में राजभाषा कार्यान्वयन समिति का गठन होना अनिवार्य है और उसकी नियमित बैठकें होनी चाहिए, ताकि हिंदी के प्रगतिशील प्रयोग की समीक्षा की जा सके। पीएसपी प्रभाग में इस समिति का या तो गठन ही नहीं किया गया है या फिर वह पूरी तरह निष्क्रिय है, जिसके कारण हिंदी विरोधी मानसिकता धड़ल्ले से फल-फूल रही है।
  अतः, इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए पीएसपी प्रभाग (विदेश मंत्रालय) की कार्यप्रणाली की उच्च स्तरीय जांच की जाए और दोषी अधिकारियों के विरुद्ध सख्त प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए भविष्य के सभी पत्राचार, परिपत्र और ऑनलाइन आवेदन प्रपत्रों को अनिवार्य रूप से एकसाथ हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में तैयार करने के निर्देश दिए जाएं।

भवदीय
अभिषेक कुमार
मप्र

(सौजन्य:वैश्विक हिन्दी सम्मेलन, मुम्बई)